1000 वर्षों की ऐतिहासिक यात्रा पर लेख साझा कर भारत की सनातन शक्ति को किया नमन

नई दिल्ली, 05 जनवरी (हि.स.)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक भावनात्मक और ऐतिहासिक लेख साझा करते हुए इसे भारत की अदम्य सांस्कृतिक चेतना, साहस और आत्मबल का जीवंत प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि समुद्र की गर्जन करती लहरों की तरह सोमनाथ की चेतना भी सदियों से निरंतर उठती रही है और हर विध्वंस के बाद और अधिक दृढ़ होकर खड़ी हुई है।

हजार वर्ष पहले का आक्रमण और आज भी अडिग सोमनाथ

प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर साझा लेख में लिखा कि वर्ष 2026 वह कालखंड है, जब सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले आक्रमण को एक हजार वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में महमूद गजनवी द्वारा किया गया आक्रमण केवल एक मंदिर को तोड़ने का प्रयास नहीं था, बल्कि भारत की आस्था, संस्कृति और सभ्यता पर हमला था। इसके बाद भी सोमनाथ पर अनेक आक्रमण हुए, लेकिन आज भी यह मंदिर पूरे गौरव और आत्मविश्वास के साथ खड़ा है।

सोमनाथ: भारत की आत्मा का शाश्वत प्रतीक

प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ मंदिर का नाम सुनते ही मन और हृदय में गर्व, श्रद्धा और आस्था की अनुभूति होती है। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित यह मंदिर भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतीकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है, जो इसकी सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता को दर्शाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति पापों से मुक्त होता है और पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

विध्वंस की नहीं, स्वाभिमान और पुनर्निर्माण की गाथा

प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ पर हुआ आक्रमण मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। ऐतिहासिक ग्रंथों में उस समय की क्रूरता और विध्वंस का वर्णन मिलता है, जिसे पढ़कर आज भी हृदय कांप उठता है। इसके बावजूद सोमनाथ की गाथा विध्वंस की नहीं, बल्कि भारत माता की संतानों के स्वाभिमान, साहस और आस्था की अमर कथा है। हर बार जब मंदिर को तोड़ा गया, तब-तब समाज ने उसे फिर से खड़ा किया।

1951 में पुनर्निर्माण और राष्ट्र चेतना का उदय

प्रधानमंत्री ने स्मरण कराया कि सोमनाथ मंदिर का वर्तमान स्वरूप वर्ष 1951 में आकार ले सका। 11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। संयोग से वर्ष 2026 मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है।

उन्होंने कहा कि आजादी के बाद सोमनाथ के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल ने अपने हाथों में लिया। 1947 में दीपावली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया और उन्होंने उसी क्षण यह संकल्प लिया कि सोमनाथ का पुनर्निर्माण होगा। हालांकि वे इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं रहे, लेकिन उनका स्वप्न राष्ट्र के सामने साकार हुआ।

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राजनीतिक मतभेद और ऐतिहासिक दृढ़ता

प्रधानमंत्री ने लेख में उल्लेख किया कि उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू इस समारोह को लेकर सहमत नहीं थे और नहीं चाहते थे कि राष्ट्रपति या मंत्री इसमें भाग लें। उनका मानना था कि इससे भारत की छवि प्रभावित होगी, लेकिन डॉ. राजेंद्र प्रसाद अपने निर्णय पर अडिग रहे। यही दृढ़ता आगे चलकर इतिहास का नया अध्याय बनी।

अहिल्याबाई होलकर, स्वामी विवेकानंद और केएम मुंशी का योगदान

प्रधानमंत्री ने देवी अहिल्याबाई होलकर के योगदान को याद करते हुए कहा कि उन्होंने कठिन कालखंड में भी सोमनाथ में पूजा और आस्था की परंपरा को जीवित रखा। उन्होंने स्वामी विवेकानंद के अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहा कि विवेकानंद ने सोमनाथ को भारतीय सभ्यता की गहराई समझने का माध्यम बताया था।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सोमनाथ का कोई भी उल्लेख केएम मुंशी के योगदान के बिना अधूरा है। उनकी पुस्तक सोमनाथ, द श्राइन इटरनल आज भी इस संघर्ष और पुनर्निर्माण की प्रेरक गाथा प्रस्तुत करती है।

सोमनाथ से विकसित भारत की प्रेरणा

प्रधानमंत्री ने कहा कि सोमनाथ का भौतिक ढांचा भले ही बार-बार नष्ट हुआ हो, लेकिन उसकी चेतना अमर रही। इन्हीं मूल्यों और संकल्पों ने भारत को हर कालखंड में फिर से उठ खड़े होने की शक्ति दी। आज दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। हमारी संस्कृति, कला, संगीत, योग और आयुर्वेद वैश्विक पहचान बना रहे हैं और वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।

समुद्र की लहरों की तरह अडिग सोमनाथ

प्रधानमंत्री ने कहा कि 1026 के आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है। तट से टकराती लहरें मानो उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह ही सोमनाथ बार-बार उठा है और हर बार पहले से अधिक मजबूत बनकर खड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा कि यदि हजार वर्ष पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो समृद्ध और विकसित भारत का निर्माण भी निश्चित है। इसी प्रेरणा के साथ देश को आगे बढ़ना है। जय सोमनाथ।

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