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अमेरिका एक राष्ट्र नहीं, एक रियल एस्टेट प्रोजेक्ट है
दुनिया को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने वाला, मानवाधिकारों का स्वयंभू ठेकेदार और वैश्विक नैतिकता का स्वयंघोषित प्रहरी-संयुक्त राज्य अमेरिका-क्या वास्तव में उतना ही महान है, जितना वह खुद को बताता है? या फिर यह एक ऐसा राष्ट्र है, जिसकी नींव किसी प्राचीन सभ्यता की तपस्या पर नहीं, बल्कि सौदों, कब्जों और अवसरवादी विस्तार पर रखी गई? यह सवाल इसलिए जरूरी है, क्योंकि अमेरिका जिस जमीन पर खड़ा होकर पूरी दुनिया को झुकाने की कोशिश करता है, वह जमीन उसकी अपनी नहीं है, बल्कि खरीदी, छीनी और दबाव में हासिल की गई जमीन है।
अमेरिका का इतिहास किसी हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक यात्रा का इतिहास नहीं है। यह इतिहास है एक उपनिवेश के धीरे-धीरे एक “रियल एस्टेट साम्राज्य” में बदलने का है।
1776 में जब अमेरिका ने ब्रिटेन से स्वतंत्रता की घोषणा की, तब उसका आकार बेहद सीमित था। वह अटलांटिक तट के आसपास सिमटा हुआ एक कमजोर राष्ट्र था। लेकिन उसकी महत्वाकांक्षा असीमित थी। उसने युद्ध से ज्यादा सौदों को हथियार बनाया और जहां सौदा संभव नहीं हुआ, वहां शक्ति का इस्तेमाल किया।
1803 में अमेरिका ने आर्थिक संकट से जूझ रहे फ्रांस से लुइसियाना का विशाल क्षेत्र खरीद लिया। यह कोई साधारण सौदा नहीं था। यह इतिहास का सबसे बड़ा “जमीन सौदा” था, जिसने एक झटके में अमेरिका का आकार दोगुना कर दिया। 1867 में उसने रूस से अलास्का खरीद लिया. यह एक ऐसा सौदा था, जिसका मजाक उड़ाया गया, लेकिन बाद में वही जमीन तेल और गैस का खजाना बन गई। 1819 में उसने स्पेन से फ्लोरिडा ले लिया क्योंकि स्पेन कमजोर था और अमेरिका ताकतवर हो रहा था। यह विस्तार वीरता की कहानी नहीं, बल्कि अवसरवाद की कहानी थी।
जहां खरीद नहीं पाए, वहां छीन लिया
जहां सौदे से बात नहीं बनी, वहां अमेरिका ने युद्ध का रास्ता चुना। 1846 में अमेरिका ने मैक्सिको के खिलाफ युद्ध छेड़ दिया। नतीजे में मैक्सिको को अपने लगभग आधे भूभाग से हाथ धोना पड़ा। आज का कैलिफोर्निया, नेवादा, यूटा, एरिजोना. ये सब कभी मैक्सिको का हिस्सा थे। यह विस्तार किसी नैतिक अधिकार से नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति के बल पर हासिल किया गया था। यह वही अमेरिका है, जो आज दुनिया को “अंतरराष्ट्रीय कानून” का सम्मान करने का पाठ पढ़ाता है।
असली मालिकों को बेदखल कर बना साम्राज्य
अमेरिका के विस्तार की सबसे बड़ी कीमत वहां के मूल निवासियों रेड इंडियंस ने चुकाई। उनकी जमीन छीनी गई, उन्हें उनके ही घर से बेदखल किया गया, उनकी सभ्यता को मिटा दिया गया। यह इतिहास का सबसे बड़ा “साइलेंट क्लीनअप” था। इसमें एक पूरी सभ्यता को खत्म कर दिया गया, ताकि एक नया राष्ट्र अपने सपनों का महल खड़ा कर सके। आज अमेरिका जिस जमीन पर खड़ा होकर शक्ति का प्रदर्शन करता है, वह जमीन कभी किसी और की पहचान थी।
खरीदी हुई ताकत का वैश्विक अहंकार
जमीन खरीदने से शुरू हुआ विस्तार धीरे-धीरे वैश्विक वर्चस्व में बदल गया। आज अमेरिका के पास दुनिया की सबसे ताकतवर सेना है। वह आर्थिक प्रतिबंधों के जरिए देशों की अर्थव्यवस्था को झुका देता है। वह अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को प्रभावित करता है, और अपने हितों के अनुसार वैश्विक एजेंडा तय करता है। नाटो जैसे सैन्य गठबंधनों के माध्यम से उसने पूरी दुनिया में अपनी सैन्य उपस्थिति कायम कर रखी है। वह तय करता है कि कौन लोकतांत्रिक है, कौन तानाशाह है, और किस देश को सजा मिलनी चाहिए। दुनिया के लिए नियम वही बनाता है और जब नियम उसके खिलाफ जाते हैं, तो वही उन्हें तोड़ भी देता है।
नैतिकता का मुखौटा, शक्ति का खेल
विडंबना यह है कि अमेरिका खुद को नैतिकता का प्रतीक बताता है, जबकि उसका अपना अस्तित्व ही शक्ति और सौदों का परिणाम है। जिस राष्ट्र का जन्म उपनिवेशवाद से हुआ हो, जिसका विस्तार जमीन की खरीद और युद्ध से हुआ हो, और जिसने अपनी ताकत का इस्तेमाल पूरी दुनिया को प्रभावित करने के लिए किया हो वह जब नैतिकता की बात करता है, तो यह इतिहास के साथ एक विडंबनापूर्ण मजाक जैसा लगता है। आज अमेरिका वैश्विक मंच पर खड़ा होकर दुनिया को निर्देश देता है, चेतावनी देता है, और दबाव बनाता है।
लेकिन इतिहास चुपचाप एक सवाल पूछता है, जिस राष्ट्र का अस्तित्व ही सौदों और कब्जों का परिणाम है, वह किस नैतिक अधिकार से दुनिया को नियमों का पाठ पढ़ा रहा है? जिस जमीन को उसने खरीदा, जिस जमीन को उसने छीना, जिस जमीन पर उसने दूसरों को हटाकर अपना झंडा लगाया, उसी जमीन पर खड़ा होकर वह आज अहंकारी बादशाह की तरह व्यवहार कर रहा है। अमेरिका की ताकत वास्तविक हो सकती है, लेकिन उसका अहंकार इतिहास की सच्चाई को नहीं बदल सकता क्योंकि सच यही है कि अमेरिका कोई सनातन सभ्यता नहीं, बल्कि खरीदी हुई जमीन पर खड़ा एक ताकतवर साम्राज्य है, जो अब खुद को दुनिया का मालिक समझने लगा है।
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