नई दिल्ली में आयोजित कार्यक्रम में ऐतिहासिक पांडुलिपि स्थायी रूप से अंतर्राष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय को भेंट
नई दिल्ली। भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत के संरक्षण की दिशा में एक अत्यंत महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए 233 वर्ष पुरानी ‘वाल्मीकि रामायण’ की दुर्लभ पांडुलिपि को अयोध्या स्थित अंतर्राष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय को स्थायी रूप से सौंप दिया गया है। यह पांडुलिपि संस्कृत भाषा और देवनागरी लिपि में रचित है तथा भारतीय सभ्यता की उस कालजयी परंपरा का प्रतिनिधित्व करती है, जिसने रामायण जैसे महाकाव्य को पीढ़ी दर पीढ़ी जीवित रखा है।
संस्कृति मंत्रालय द्वारा मंगलवार को जारी जानकारी के अनुसार, नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेड़ी ने यह ऐतिहासिक पांडुलिपि प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय की कार्यकारी परिषद के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा को औपचारिक रूप से भेंट की। नृपेंद्र मिश्रा श्रीराम जन्मभूमि ट्रस्ट के सदस्य भी हैं और राम मंदिर परिसर से जुड़े प्रमुख दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं। यह पांडुलिपि पूर्व में राष्ट्रपति भवन को प्रदर्शनी के लिए प्रदान की गई थी, लेकिन अब इसे स्थायी रूप से अयोध्या के राम कथा संग्रहालय को सौंपने का निर्णय लिया गया है।
अयोध्या को लौटाई गई रामायण की धरोहर
इस निर्णय के पीछे सरकार और सांस्कृतिक संस्थानों की वह साझा सोच है, जिसके तहत रामायण से जुड़ी ऐतिहासिक और आध्यात्मिक विरासत को उसके मूल केंद्र अयोध्या में स्थापित किया जा रहा है। अयोध्या केवल एक धार्मिक नगरी नहीं, बल्कि रामायण की जीवंत परंपरा का केंद्र रही है। अंतर्राष्ट्रीय राम कथा संग्रहालय में इस पांडुलिपि के स्थापित होने से न केवल देश, बल्कि विश्वभर से आने वाले शोधकर्ताओं, विद्वानों और श्रद्धालुओं को रामायण की प्राचीन लेखन परंपरा को निकट से देखने और समझने का अवसर मिलेगा।
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विक्रम संवत 1849 की दुर्लभ कृति
ऐतिहासिक दृष्टि से यह पांडुलिपि अत्यंत अमूल्य मानी जाती है। इसका लेखन विक्रम संवत 1849, अर्थात 1792 ईस्वी में किया गया था। इसमें महेश्वर तीर्थ द्वारा रचित शास्त्रीय टीका के साथ वाल्मीकि रामायण के मूल श्लोक संकलित हैं। यह पांडुलिपि उस दौर की विद्वत परंपरा, भाषा शैली और संरक्षण विधियों को दर्शाती है, जब हस्तलिखित ग्रंथों के माध्यम से ज्ञान को सुरक्षित रखा जाता था। इसमें रामायण के पांच प्रमुख कांड—बालकांड, आरण्यकांड, किष्किंधाकांड, सुंदरकांड और युद्धकांड—सम्मिलित हैं, जो न केवल रामकथा की घटनाओं को, बल्कि उसके दार्शनिक और नैतिक मूल्यों को भी गहराई से प्रस्तुत करते हैं।
विद्वानों और भक्तों के लिए खुला ज्ञानकोष
पांडुलिपि भेंट करते समय प्रोफेसर श्रीनिवास वरखेड़ी ने कहा कि यह उपहार वाल्मीकि रामायण के गहन और कालजयी ज्ञान को अमर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। अयोध्या के पवित्र वातावरण में यह पांडुलिपि अब दुनिया भर के विद्वानों, शोधकर्ताओं और भक्तों के लिए सुलभ होगी। उन्होंने कहा कि यह केवल एक ग्रंथ नहीं, बल्कि भारत की बौद्धिक और आध्यात्मिक परंपरा का जीवंत प्रमाण है।
नृपेंद्र मिश्रा ने इस अवसर को ऐतिहासिक बताते हुए कहा कि अयोध्या स्थित राम कथा संग्रहालय को वाल्मीकि रामायण की इस दुर्लभ पांडुलिपि का दान राम भक्तों और राम मंदिर परिसर के लिए एक स्मरणीय क्षण है। उन्होंने कहा कि यह पांडुलिपि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी और रामायण की सांस्कृतिक विरासत को वैश्विक मंच पर और सशक्त रूप से प्रस्तुत करेगी।
सांस्कृतिक पुनर्स्थापन की दिशा में बड़ा कदम
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की ऐतिहासिक पांडुलिपियों को उनके सांस्कृतिक केंद्रों में स्थापित करना भारतीय विरासत के पुनर्स्थापन की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। अयोध्या में राम मंदिर के साथ-साथ राम कथा संग्रहालय का विकास भारत की सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर मजबूती प्रदान कर रहा है। यह पांडुलिपि न केवल संग्रहालय की शोभा बढ़ाएगी, बल्कि रामायण पर आधारित अध्ययन और शोध को भी नई दिशा देगी।
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