सर्वोच्च न्यायालय ने कहा: साजिश में केंद्रीय भूमिका, एक साल में गवाहों के बयान पूरे करने के निर्देश
नई दिल्ली।
दिल्ली दंगों से जुड़े बहुचर्चित मामले में सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और अहम फैसला सुनाते हुए उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं। जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि रिकॉर्ड से यह संकेत मिलता है कि दोनों आरोपितों की भूमिका केवल सहभागी की नहीं, बल्कि पूरी साजिश के “आर्किटेक्ट” की तरह रही है। अदालत ने माना कि इस स्तर की भूमिका को देखते हुए जमानत देना इस समय उचित नहीं है।
साजिश में केंद्रीय भूमिका का उल्लेख
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध सामग्री यह दर्शाती है कि उमर खालिद और शरजील इमाम की भूमिका दिल्ली दंगों की कथित साजिश में केंद्रीय रही है। अदालत ने कहा कि यह मामला केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें देश की सुरक्षा और अखंडता से जुड़े गंभीर प्रश्न भी शामिल हैं। ऐसे मामलों में केवल लंबे समय से हिरासत में होने के आधार पर जमानत नहीं दी जा सकती।
एक साल में गवाहों के बयान पूरे करने के निर्देश
अदालत ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वह एक वर्ष के भीतर सभी गवाहों के बयान दर्ज कराए। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जब सभी गवाहों के बयान पूरे हो जाएंगे, उसके बाद दोनों आरोपित जमानत के लिए दोबारा आवेदन कर सकते हैं। साथ ही ट्रायल कोर्ट को यह सुनिश्चित करने का आदेश दिया गया कि मुकदमे की कार्यवाही में अनावश्यक देरी न हो और संरक्षित गवाहों का परीक्षण बिना किसी बाधा के किया जाए।
अनुच्छेद 21 और प्री-ट्रायल हिरासत पर टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रायल से पहले की हिरासत को सजा नहीं माना जा सकता, लेकिन राज्य को यह दिखाना होगा कि लंबे समय तक प्री-ट्रायल हिरासत क्यों आवश्यक है। अदालत ने कहा कि प्रत्येक आरोपी की भूमिका अलग-अलग होती है और सभी को एक ही तराजू में नहीं तौला जा सकता।
यूएपीए की धारा 15 पर सुप्रीम कोर्ट की व्याख्या
अदालत ने गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 की धारा 15 का उल्लेख करते हुए कहा कि सुरक्षा को खतरा पहुंचाने या आतंक फैलाने के इरादे से किया गया कोई भी कार्य आतंकी गतिविधि के दायरे में आता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि चाहे कोई विशेष कानून कितना ही कठोर क्यों न हो, अदालतें उसे लागू करने के लिए बाध्य हैं। न्यायालय विचारधारा के आधार पर नहीं, बल्कि कानून के प्रावधानों के अनुसार निर्णय देता है।
ट्रायल में देरी को नहीं बनाया जा सकता आधार
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि देश की सुरक्षा और अखंडता से जुड़े मामलों में ट्रायल में देरी को “तुरुप के पत्ते” की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि भले ही आरोपी लंबे समय से हिरासत में हों, लेकिन यदि आरोप गंभीर प्रकृति के हैं और रिकॉर्ड में पर्याप्त सामग्री मौजूद है, तो केवल देरी के आधार पर राहत नहीं दी जा सकती।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में भी प्रतिक्रिया देखने को मिली। भारतीय जनता पार्टी ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि अदालत का फैसला यह साबित करता है कि कानून अपना काम कर रहा है और देश की सुरक्षा से जुड़े मामलों में कोई ढील नहीं दी जा सकती। वहीं विपक्षी दलों की ओर से इस पर अलग-अलग प्रतिक्रियाएं सामने आईं।
ट्रायल को तेज करने के स्पष्ट निर्देश
उच्चतम न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट को यह भी निर्देश दिया कि मुकदमे की सुनवाई को तेज किया जाए और सभी प्रक्रियाएं समयबद्ध तरीके से पूरी हों। अदालत ने कहा कि न्याय में देरी, न्याय से वंचित करने के समान हो सकती है, इसलिए इस मामले में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।
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