अंतरिक्ष मौसम की गंभीर घटनाएं उपग्रहों, संचार प्रणालियों और विद्युत ढांचे के लिए बन सकती हैं बड़ा खतरा

बेंगलुरू। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के महत्वाकांक्षी सौर मिशन आदित्य-एल1 से प्राप्त नवीन वैज्ञानिक आंकड़ों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि शक्तिशाली सौर तूफान पृथ्वी के चुंबकीय कवच पर अत्यंत गंभीर और दूरगामी प्रभाव डाल सकते हैं। इसरो द्वारा जारी बयान और हाल ही में प्रकाशित एक विस्तृत शोध अध्ययन में यह सामने आया है कि सूर्य से निकलने वाले तीव्र प्लाज़्मा विस्फोट जब पृथ्वी से टकराते हैं, तो वे न केवल अंतरिक्ष वातावरण को अस्थिर करते हैं, बल्कि पृथ्वी की तकनीकी प्रणालियों के लिए भी गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं।

इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार, सौर तूफान का सबसे खतरनाक प्रभाव उसके तथाकथित अशांत या टर्बुलेंट क्षेत्र के पृथ्वी से टकराने के दौरान देखा गया। यह वही चरण होता है, जब सौर प्लाज़्मा और चुंबकीय तरंगें अत्यधिक अव्यवस्थित और शक्तिशाली रूप में पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र पर दबाव डालती हैं। इसरो ने स्पष्ट किया कि इसी अशांत चरण के दौरान पृथ्वी के चुंबकीय कवच में असामान्य संकुचन दर्ज किया गया, जो सामान्य परिस्थितियों में नहीं देखा जाता।

अक्टूबर 2024 की अंतरिक्ष घटना का विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण

इस महत्वपूर्ण शोध का आधार अक्टूबर 2024 में पृथ्वी को प्रभावित करने वाली एक बड़ी अंतरिक्ष मौसम घटना है। इस घटना का गहन अध्ययन दिसंबर 2025 में अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठित शोध पत्रिका एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित किया गया। इस अध्ययन में इसरो के वैज्ञानिकों और शोध छात्रों ने आदित्य-एल1 से प्राप्त उच्च गुणवत्ता वाले डेटा के साथ-साथ अन्य अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष अभियानों के आंकड़ों का भी उपयोग किया।

अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि सूर्य से निकले विशाल सौर प्लाज़्मा विस्फोट पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र और अंतरिक्ष वातावरण को किस प्रकार प्रभावित करते हैं। वैज्ञानिकों ने पाया कि इस विशेष घटना के दौरान पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र अत्यधिक संकुचित हो गया, जिससे वह असामान्य रूप से पृथ्वी की सतह के काफी नजदीक आ गया।

भू-स्थिर कक्षा में मौजूद उपग्रहों पर खतरा

इसरो के अनुसार, चुंबकीय क्षेत्र के इस असामान्य संकुचन का एक गंभीर परिणाम यह रहा कि भू-स्थिर कक्षा में स्थित कुछ उपग्रह अस्थायी रूप से पृथ्वी के चुंबकीय प्रभाव क्षेत्र के भीतर आ गए। सामान्य परिस्थितियों में यह स्थिति उत्पन्न नहीं होती और इसे केवल अत्यंत गंभीर अंतरिक्ष मौसम घटनाओं के दौरान ही देखा जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि ऐसे सौर तूफानों की तीव्रता और अवधि अधिक हो, तो उपग्रहों की कार्यक्षमता, संचार प्रणालियों और दिशा-निर्देशन सेवाओं पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है।

ऑरोरल क्षेत्रों में तीव्र विद्युत धाराएं

अध्ययन में यह भी सामने आया कि सौर तूफान के अशांत चरण के दौरान पृथ्वी के उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों, जिन्हें ऑरोरल क्षेत्र कहा जाता है, वहां विद्युत धाराएं असाधारण रूप से तीव्र हो गईं। यह प्रक्रिया ऊपरी वायुमंडल को गर्म कर सकती है, जिससे वायुमंडलीय गैसों का पलायन बढ़ जाता है। वैज्ञानिक भाषा में इसे एटमॉस्फेरिक एस्केप कहा जाता है, जो दीर्घकाल में पृथ्वी के वायुमंडलीय संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

अंतरिक्ष मौसम और आधुनिक सभ्यता

इसरो ने अपने बयान में यह भी स्पष्ट किया कि अंतरिक्ष मौसम से आशय उन परिस्थितियों से है, जो सूर्य पर होने वाली अस्थायी लेकिन तीव्र गतिविधियों, जैसे सौर प्लाज़्मा विस्फोट और सौर तूफान, के कारण अंतरिक्ष में उत्पन्न होती हैं। आधुनिक युग में, जब मानव जीवन उपग्रह आधारित संचार, नेविगेशन और विद्युत ग्रिड पर अत्यधिक निर्भर हो गया है, तब ऐसी अंतरिक्ष मौसम घटनाएं बड़े पैमाने पर अव्यवस्था पैदा कर सकती हैं।

निरंतर निगरानी की आवश्यकता पर जोर

इसरो के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस अध्ययन के निष्कर्ष सौर गतिविधियों की निरंतर और सटीक निगरानी की आवश्यकता को और अधिक मजबूत करते हैं। आदित्य-एल1 जैसे मिशन सूर्य की गतिविधियों पर लगातार नजर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। वास्तविक समय में अंतरिक्ष मौसम का आकलन करने से न केवल संभावित खतरों की पूर्व चेतावनी दी जा सकती है, बल्कि महत्वपूर्ण अंतरिक्ष परिसंपत्तियों की सुरक्षा के लिए समय रहते आवश्यक कदम भी उठाए जा सकते हैं।

इसरो का यह शोध यह संकेत देता है कि भविष्य में अंतरिक्ष मौसम विज्ञान न केवल वैज्ञानिक दृष्टि से, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, संचार व्यवस्था और तकनीकी अवसंरचना की दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण विषय बनने जा रहा है। आदित्य-एल1 से प्राप्त ये जानकारियां भारत को इस क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर एक सशक्त और जिम्मेदार भूमिका निभाने की दिशा में आगे बढ़ाती हैं।

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