पटियाला हाउस कोर्ट ने चार आरोपियों की न्यायिक हिरासत 6 फरवरी तक बढ़ाई

नई दिल्ली। संसद की सुरक्षा में हुई चूक के मामले में दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने चार आरोपियों की न्यायिक हिरासत 6 फरवरी तक बढ़ा दी है। शनिवार को हुई सुनवाई के दौरान मामले के सभी छह आरोपी अदालत में पेश हुए। अदालत ने स्पष्ट किया कि अगली सुनवाई 6 फरवरी को होगी, जिसमें सभी आरोपियों के खिलाफ आरोप तय करने और आरोपी ललित झा द्वारा दायर आरोप मुक्त करने की अर्जी पर विचार किया जाएगा।

आरोप तय करने और आरोपमुक्ति याचिका पर होगी अगली सुनवाई

कोर्ट ने इस मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि 6 फरवरी को दो महत्वपूर्ण बिंदुओं पर सुनवाई होगी। पहला, सभी आरोपियों के खिलाफ औपचारिक रूप से आरोप तय किए जाएंगे या नहीं, और दूसरा, आरोपी ललित झा द्वारा दायर आरोप मुक्त करने की अर्जी पर निर्णय लिया जाएगा। दिल्ली पुलिस ने अदालत के समक्ष ललित झा की आरोप मुक्त करने की अर्जी का कड़ा विरोध किया और कहा कि जांच में उसके खिलाफ पर्याप्त साक्ष्य मौजूद हैं।

दिल्ली पुलिस ने ललित झा की याचिका का किया विरोध

दिल्ली पुलिस ने कोर्ट को बताया कि संसद सुरक्षा उल्लंघन जैसे गंभीर मामले में किसी भी आरोपी को राहत देना जांच और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से उचित नहीं होगा। पुलिस का कहना है कि ललित झा की भूमिका केवल सहायक नहीं बल्कि साजिश से जुड़ी हुई है, इसलिए उसे आरोप मुक्त करने का कोई आधार नहीं बनता। कोर्ट ने पुलिस के तर्कों को रिकॉर्ड में लेते हुए मामले की अगली सुनवाई की तारीख तय कर दी।

सभी आरोपी शनिवार को कोर्ट में हुए पेश

शनिवार को हुई सुनवाई के दौरान इस मामले के सभी आरोपी अदालत में पेश हुए। कोर्ट ने उनकी मौजूदगी दर्ज करते हुए हिरासत बढ़ाने का आदेश पारित किया। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक आरोप तय नहीं हो जाते, तब तक न्यायिक हिरासत जारी रहेगी, ताकि मामले की निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित की जा सके।

दिल्ली उच्च न्यायालय पहले दे चुका है दो आरोपियों को जमानत

इस मामले में पहले ही दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2 जुलाई 2025 को दो आरोपियों नीलम आजाद और महेश कुमावत को जमानत दे दी थी। उच्च न्यायालय ने दोनों आरोपियों को 50-50 हजार रुपये के मुचलके पर जमानत देने का आदेश दिया था। हालांकि, जमानत के साथ कोर्ट ने कई सख्त शर्तें भी लगाई थीं।

जमानत के साथ कड़े प्रतिबंध लगाए गए

दिल्ली उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि नीलम आजाद और महेश कुमावत किसी भी प्रकार की प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करेंगे और न ही मीडिया को कोई इंटरव्यू देंगे। इसके साथ ही उन्हें इस घटना से संबंधित किसी भी तरह की जानकारी सोशल मीडिया पर साझा करने से भी प्रतिबंधित किया गया था। अदालत ने कहा था कि ऐसा कोई भी कृत्य न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।

नियमित पुलिस रिपोर्टिंग का भी आदेश

उच्च न्यायालय ने दोनों आरोपियों को निर्देश दिया था कि वे संबंधित थाने में सोमवार, बुधवार और शुक्रवार को सुबह 10 बजे उपस्थित होकर अपनी हाजिरी दर्ज कराएं। कोर्ट का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि जमानत पर रिहा आरोपियों की गतिविधियों पर निगरानी बनी रहे और वे जांच में पूरा सहयोग करें।

संसद सुरक्षा से जुड़ा मामला, इसलिए बढ़ी सख्ती

यह मामला संसद जैसी सर्वोच्च संवैधानिक संस्था की सुरक्षा से जुड़ा होने के कारण अदालतें इसे अत्यंत गंभीरता से ले रही हैं। न्यायिक प्रक्रिया के दौरान बार-बार यह बात सामने रखी जा रही है कि किसी भी तरह की लापरवाही या नरमी से भविष्य में सुरक्षा व्यवस्था पर गलत संदेश जा सकता है। इसी कारण निचली अदालत से लेकर उच्च न्यायालय तक हर स्तर पर सख्त शर्तों और निगरानी के साथ फैसले दिए जा रहे हैं।

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