उत्तर प्रदेश की धार्मिक नगरी काशी में शनिवार को संतों ने ज्ञानवापी परिसर स्थित मां श्रृंगार गौरी का विधिवत पूजन के बाद नौ दिवसीय रामकथा का शुभारंभ किया। माघ माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि से श्री काशी विश्वनाथ धाम में रामकथा साधु-संतों की उपस्थिति में होगी। संतों के हर—हर महादेव के उद्घोष से पूरा परिसर गुंजायमान रहा। 

श्रृंगार गौरी के मंदिर में अवशेष को रखा 

अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जीतेन्द्रानंद ने बताया कि यूं तो काशी विश्वनाथ मंदिर को इतिहास में सात बार तोड़ा गया। 19 अप्रैल 1669 को औरंगजेब के आदेश से जब टूटा तो उस समय काशी के वैदिक ब्राह्मणों ने तय किया कि क्या प्रमाण रहेगा कि हमारा मंदिर यही था। कुछ दिन बाद इसके निशान भी मिट जाएंगे। उन लोगों ने श्रृंगार गौरी के मंदिर में अवशेष को रखा था, ताकि मंदिर की परंपरा और स्मृति को जीवित रखा जा सके।

काशी विश्वनाथ को रामकथा सुनाने की परंपरा वर्षों पुरानी 

स्वामी जीतेन्द्रांनद ने बताया कि श्रृंगार गौरी के अवशेष स्वरूप का पूजन कर काशी विश्वनाथ को रामकथा सुनाने की परंपरा प्रारंभ की गई, जो 1965 तक बिना किसी प्रमाण और बाधा के प्रतिवर्ष चलती रही। वर्ष 1965 में नगर निगम के गठन के बाद इस परंपरा को विधिवत कानूनी मान्यता मिली और तब से यह कथा आधिकारिक रूप से आयोजित हो रही है। माघ मास के षष्ठी तिथि से पूर्णिमा तक यह कथा चलेगी। उन्होंने कहा कि मां श्रृंगार गौरी की विधिवत पूजा कर बाबा विश्वनाथ से यह कामना की गई है कि ज्ञानवापी का यह परिसर आतताइयों से मुक्त हो और यहां पर पुन: भव्य दिव्य बाबा विश्वनाथ का ज्योर्तिलिंग द्वादश ज्योर्तिलिंग बाबा विश्वेश्वर पुन: स्थापित हो।

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संतों ने मां श्रृंगार गौरी की विधिवत पूजा की

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