सर्वोच्य न्यायालय ने शुक्रवार को केंद्र की मासिक धर्म स्वच्छता नीति लागू करने की मांग पर अदालत ने यह फैसला सुनाया। इसके तहत मसिक धर्म में लड़कियों को विद्यालय में ही निशुल्क सैनेट्री पेड मिलेगे। 

आदेश अवहेलना पर मान्यता तक रद्द

केंद्र सरकार के मासिक धर्म स्वच्छता नीति को पूरे देश में लागू कराने को लेकर इस मामले में लगभग चार साल से सुनवाई चल रही थी। आज इसका निर्णय लिया गया है।  न्यायालय ने इस आदेश को सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में यह लागू किया है साथ ही दिव्यांग विद्यार्थीयों के लिए भी अलग शौचालय की व्यावस्था कराने के निर्देश देिए हैंं। साथ ही साथ चेतावनी भी दी है कि अगर आदेश का कोई विद्यालय उल्लंखन करता है, तो मान्यता तक रद्द की जा सकती है। 

समाज सेविका जया ठाकुर ने 2022 में एक जनहित याचिका लगाई थी। उनकी मांग थी कि “मेन्स्ट्रुयल हाइजीन पॉलिसी” को पूरे देश में लागू किया जाए।

न्यायालय ने पूछे दो सवाल

  • अगर स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग टॉयलेट नहीं हैं तो यह संविधान के अनुच्छेद 14 (बराबरी का अधिकार) का उल्लंघन है। अगर लड़कियों को सैनिटरी पैड नहीं मिलते तो वे लड़कों की तरह बराबरी से पढ़ाई और गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले पातीं।
  • मासिक धर्म के दौरान सम्मानजनक सुविधा मिलना संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और गरिमा का अधिकार) का हिस्सा है। अगर लड़कियों को उचित सुविधा नहीं मिलती तो उनकी गरिमा और निजता प्रभावित होती है।

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क्या ऐसी कोई सुविधाओं की कमी मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के खिलाफ है 

कोर्ट ने कहा- लड़कियों के शरीर को बोझ के रूप में देखा जाता है

यह आदेश सिर्फ कानूनी व्यवस्था से जुड़े लोगों के लिए नहीं है। यह उन क्लासरूम के लिए भी है, जहां लड़कियां मदद मांगने में झिझकती हैं। यह उन टीचर्स के लिए है, जो मदद करना चाहते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण बंधे हुए हैं। यह उन माता-पिता के लिए भी है, जो शायद यह नहीं समझ पाते कि उनकी चुप्पी का क्या असर पड़ता है।

यह समाज के लिए भी है, ताकि प्रगति का पैमाना इस बात से तय हो कि हम अपने सबसे कमजोर वर्ग की कितनी सुरक्षा करते हैं। हम हर उस बच्ची तक यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं, जो स्कूल में अनुपस्थिति की शिकार बनी, क्योंकि उसके शरीर को बोझ की तरह देखा गया, जबकि इसमें उसकी कोई गलती नहीं है।

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