संघ के शताब्दी वर्ष पर मुंबई में ‘नए क्षितिज’ कार्यक्रम, समाज समरसता और संवाद पर दिया जोर

मुंबई में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर आयोजित ‘नए क्षितिज’ कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने कहा कि हिन्दुत्व में ही सबकी सुरक्षा की गारंटी निहित है। उन्होंने कहा कि भाषा, वेशभूषा, खान-पान और रीति-रिवाज में विविधता के बावजूद राष्ट्र और संस्कृति के आधार पर हम सभी एक हैं। इस सत्य को स्वीकार करने से किसी को अपनी पहचान छोड़ने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

विविधता में एकता का संदेश

भागवत ने अपने संबोधन में कहा कि समाज में अलग-अलग परंपराएं और मान्यताएं होना स्वाभाविक है, लेकिन सांस्कृतिक मूल एक ही हैं। उन्होंने कहा कि संवाद के माध्यम से इस बोध को मजबूत करने की जरूरत है। उनके अनुसार लोगों को अपने मूल को पहचानते हुए आपसी जुड़ाव बढ़ाना चाहिए।

उन्होंने यह भी कहा कि संघ को समझने के लिए प्रत्यक्ष अनुभव जरूरी है। शाखाओं, कार्यक्रमों और स्वयंसेवकों के व्यवहार को देखकर ही संगठन के कार्यों का आकलन किया जाना चाहिए। तथ्यों के आधार पर असहमति का भी स्वागत है।

शाखा और समाजकार्य का संबंध

भागवत ने कहा कि संघ की शाखा में एक घंटे शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक अभ्यास के बाद शेष समय समाज के लिए कार्य करना ही मुख्य मार्ग है। जो भी व्यक्ति भारत को उसके स्वत्व के आधार पर मजबूत बनाने के लिए प्रयासरत है, वह व्यापक अर्थ में इसी दिशा में योगदान दे रहा है।

उन्होंने आग्रह किया कि समाज के लोग सही स्रोतों से जानकारी प्राप्त करें और प्रत्यक्ष अनुभव से मत बनाएं।

पंच परिवर्तन और समरसता

संघ प्रमुख ने ग्राम विकास, गोसेवा और अन्य सर्वमान्य कार्यों का उल्लेख करते हुए कहा कि इनसे समाज में सकारात्मक बदलाव आता है। सज्जन शक्ति को सक्रिय करने और आपसी समन्वय बढ़ाने के लिए पंच परिवर्तन का अभियान चलाया जा रहा है।

उन्होंने सामाजिक समरसता को अत्यंत आवश्यक बताते हुए कहा कि अपने आसपास हर वर्ग के लोगों के साथ आत्मीय संबंध बनाना चाहिए। इससे बिना अतिरिक्त संसाधन के समाज में बड़ा परिवर्तन संभव है। परिवार के भीतर मिलने वाले संस्कारों को उन्होंने जीवन भर प्रभावी बताया।

परिवार में संवाद की जरूरत

भागवत ने कहा कि आज के समय में परिवार के सदस्य अधिक समय दूरसंचार उपकरणों पर बिताते हैं। ऐसे में सप्ताह में एक दिन सामूहिक चर्चा और साथ भोजन करने की परंपरा विकसित करनी चाहिए। परिवार में सेवा कार्यों की चर्चा से सकारात्मक वातावरण बनता है, जिसे उन्होंने मंगल संवाद बताया।

उन्होंने अपनी भाषा और परंपराओं को अपनाने पर भी बल दिया और कहा कि छोटे-छोटे प्रयास मिलकर बड़े बदलाव का आधार बनते हैं। स्वयंसेवक अपने घरों से इसकी शुरुआत कर चुके हैं और समाज से भी इसे अपनाने का आग्रह किया जा रहा है।

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