भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते से निर्यात, निवेश और रोजगार को मिलेगी ऐतिहासिक गति

नई दिल्ली, 27 जनवरी (हि.स.)। भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते को लेकर बनी सहमति को केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक और अभूतपूर्व करार दिया है। सरकार का मानना है कि इस समझौते के प्रभावी होते ही भारतीय उत्पादों की यूरोपीय बाज़ारों में पैठ तेज़ी से बढ़ेगी और इससे न केवल निर्यात को नया आयाम मिलेगा, बल्कि भारत के दीर्घकालिक आर्थिक लक्ष्यों को भी मजबूती मिलेगी। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया कि यह समझौता भारत की अर्थव्यवस्था को 2047 तक 300 खरब डॉलर से अधिक के स्तर पर ले जाने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित होगा।

यह बातें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारत यात्रा पर आए यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो लुइस सैंटोस दा कोस्टा तथा यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन के बीच हैदराबाद हाउस में आयोजित 16वीं भारत–यूरोपीय संघ शिखर बैठक के बाद आयोजित संयुक्त संवाददाता सम्मेलन में कही गईं। इस अवसर पर विदेश सचिव विक्रम मिस्री भी उपस्थित थे, जिन्होंने शिखर बैठक के प्रमुख निर्णयों और सहमतियों की विस्तृत जानकारी साझा की।

विदेश सचिव ने बताया कि 16वीं भारत–यूरोपीय संघ शिखर बैठक की सह-अध्यक्षता प्रधानमंत्री मोदी और यूरोपीय संघ के शीर्ष नेतृत्व ने की। बैठक के दौरान प्रतिबंधित प्रारूप और प्रतिनिधिमंडल स्तर पर व्यापक द्विपक्षीय वार्ताएं हुईं। प्रधानमंत्री ने यूरोपीय संघ के नेताओं के सम्मान में दोपहर के भोज का आयोजन भी किया। इस शिखर बैठक में कई अहम दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए गए और उनका आदान–प्रदान हुआ, जिनमें भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते की वार्ता के समापन पर संयुक्त घोषणा, सुरक्षा और रक्षा साझीदारी से जुड़ा एक महत्वपूर्ण समझौता तथा मानव संसाधनों की आवाजाही को लेकर व्यापक सहयोग ढांचे पर सहमति शामिल है।

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विक्रम मिस्री ने विशेष रूप से मानव संसाधनों की आवाजाही से जुड़े समझौते को ऐतिहासिक बताया। उन्होंने कहा कि यह यूरोपीय संघ के स्तर पर किसी भी साझेदार देश के साथ किया गया पहला ऐसा व्यापक समझौता है। इसके तहत सुरक्षित और नियमित प्रवासन को बढ़ावा मिलेगा, कौशल विकास को प्रोत्साहन मिलेगा और उच्च कुशल श्रमिकों, छात्रों, शोधकर्ताओं तथा अल्पकालिक श्रमिकों की आवाजाही को आसान बनाया जाएगा। इसके साथ ही भारत–यूरोपीय संघ त्रिपक्षीय साझीदारी के तहत कई नई परियोजनाओं की घोषणा की गई है। वर्ष 2030 तक वैज्ञानिक और तकनीकी सहयोग समझौते के नवीनीकरण, उन्नत ई-हस्ताक्षर और मुहरों से जुड़ी प्रशासनिक व्यवस्थाओं, भारतीय रिज़र्व बैंक और यूरोपीय प्रतिभूति एवं बाजार प्राधिकरण के बीच समझौते, आपदा जोखिम प्रबंधन में सहयोग तथा होराइजन यूरोप कार्यक्रम के साथ भारत के सहयोग पर खोजपूर्ण वार्ता शुरू करने जैसे निर्णय भी लिए गए हैं। इसके अलावा हरित हाइड्रोजन पर एक संयुक्त कार्यबल के गठन और कौशल गतिशीलता बढ़ाने के लिए भारत में यूरोपीय संघ के पायलट कानूनी गेटवे कार्यालय की स्थापना पर भी सहमति बनी है।

भारत–यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते के आर्थिक पहलुओं पर विस्तार से बोलते हुए केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि यूरोपीय संघ सामूहिक रूप से लगभग 65 खरब डॉलर मूल्य के सामान और करीब 30 खरब डॉलर मूल्य की सेवाओं का आयात करता है, जबकि भारत की हिस्सेदारी इसमें अभी बेहद सीमित है। वर्तमान में यूरोप में आयात किए जाने वाले सामानों में भारत का हिस्सा केवल लगभग 1.5 प्रतिशत और सेवाओं में करीब 2.5 प्रतिशत के आसपास है। इस समझौते के बाद अवसरों का दायरा कई गुना बढ़ेगा और यूरोपीय संघ ने कई नए क्षेत्रों को भारतीय उत्पादों और सेवाओं के लिए खोला है। उन्होंने कहा कि सेवा क्षेत्र पर विशेष जोर दिया गया है, जिससे आईटी, पेशेवर सेवाओं और अन्य आधुनिक क्षेत्रों को सीधा लाभ मिलेगा।

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गोयल ने बताया कि समुद्री उत्पादों पर लगभग 94 प्रतिशत टैरिफ लाइनों को शुल्क मुक्त पहुंच मिलेगी और निर्यात की जाने वाली वस्तुओं के लगभग पूरे मूल्य को यूरोपीय बाजार में बिना शुल्क प्रवेश की सुविधा प्राप्त होगी। कपड़ा, परिधान, गृह सजावट और साज–सज्जा जैसे श्रम–गहन क्षेत्रों के लिए यह समझौता बेहद लाभकारी है, क्योंकि इन क्षेत्रों में पहले ही दिन से यूरोपीय बाजार का लगभग 100 प्रतिशत हिस्सा भारतीय व्यापार के लिए खुल जाएगा। फर्नीचर, लाइटिंग और अन्य उपभोक्ता सामानों के मामले में भी भारत के लगभग सभी निर्यात को पहले दिन से ही ड्यूटी फ्री पहुंच मिलने की व्यवस्था की गई है।

उन्होंने यह भी कहा कि खिलौने, खेल सामग्री, रेलवे के घटक, विमान के पुर्जे, चमड़ा और जूते जैसे क्षेत्र भारत के लिए विशेष महत्व रखते हैं और इन सभी को इस समझौते से बड़ा लाभ मिलने की उम्मीद है। वहीं दूसरी ओर, भारत भी यूरोपीय संघ के हितों को ध्यान में रखते हुए ऑटो कंपोनेंट्स, ऑटोमोबाइल, वाइन और स्पिरिट जैसे उत्पादों के आयात के लिए अपने बाजार को चरणबद्ध तरीके से खोलेगा। इस प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया गया है कि संवेदनशील क्षेत्रों को या तो दायरे से बाहर रखा जाए या फिर उद्योगों को समायोजन का पर्याप्त समय दिया जाए।

ऑटोमोबाइल क्षेत्र को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में पीयूष गोयल ने कहा कि भारत बड़े पैमाने पर छोटे और कम लागत वाले ऑटोमोबाइल का उत्पादन करता है, जबकि जर्मनी जैसे देशों की विशेषज्ञता उच्च तकनीक और प्रीमियम वाहनों में है। इसी संतुलन के आधार पर दोनों पक्षों के हितों की रक्षा करते हुए एक सौहार्दपूर्ण समझ बनाई गई है। उन्होंने कहा कि यह मॉडल सेक्टर दर सेक्टर अपनाया गया है और आज दुनिया के सामने एक ऐसा समझौता रखा गया है, जो बाजार पहुंच के लिहाज से अभूतपूर्व है। यह समझौता ‘मेक इन इंडिया’ को मजबूत करेगा, यूरोपीय उद्योगों को भी समर्थन देगा और दोनों क्षेत्रों में निवेश के नए अवसर खोलेगा। गोयल ने भरोसा जताया कि यूरोप से भारत में निवेश का प्रवाह आने वाले वर्षों में कई गुना बढ़ सकता है।

रोजगार सृजन के सवाल पर गोयल ने कहा कि कपड़ा उद्योग, कृषि के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा रोजगार सृजन करने वाला क्षेत्र है, जिसमें करीब चार करोड़ लोगों को काम मिलता है। वर्तमान में भारत यूरोपीय संघ को लगभग 7 अरब डॉलर मूल्य के वस्त्र और परिधान निर्यात करता है, जिन पर 12 प्रतिशत तक शुल्क लगता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि बांग्लादेश जैसे देशों को शून्य शुल्क का लाभ मिलने के कारण वे यूरोपीय संघ के 250 अरब डॉलर के वस्त्र बाजार में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर पाए। अब भारत के लिए भी यही अवसर खुल रहा है और आने वाले समय में वस्त्र निर्यात 7 अरब डॉलर से बढ़कर 30–40 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। केवल इस क्षेत्र में ही 60–70 लाख नए रोजगार सृजित होने की संभावना है, जिससे देश के श्रम–गहन क्षेत्रों को जबरदस्त प्रोत्साहन मिलेगा।

भारत और यूरोप के बीच कनेक्टिविटी, विशेष रूप से आईएमईसी कॉरिडोर को लेकर पूछे गए सवाल पर विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने कहा कि यह दोनों पक्षों के एजेंडे का अहम हिस्सा है। इस पहल को आगे बढ़ाने पर सहमति बनी है और अब कार्य–स्तरीय बैठकों के बाद उच्च–स्तरीय चर्चाओं के माध्यम से इसे गति दी जाएगी। भारत और यूरोप इस मुद्दे पर एकजुट हैं और अन्य साझेदार देशों के साथ मिलकर इसे आगे बढ़ाएंगे।

रूस–यूक्रेन युद्ध पर हुई चर्चा के संदर्भ में विक्रम मिस्री ने बताया कि यूरोपीय नेताओं ने अपने विचार और चिंताएं साझा कीं, जबकि प्रधानमंत्री मोदी ने स्पष्ट किया कि भारत दोनों देशों के नेतृत्व के साथ लगातार संपर्क में है। भारत हमेशा से इस संघर्ष के शांतिपूर्ण और संवाद आधारित समाधान का समर्थक रहा है। प्रधानमंत्री ने दोहराया कि भारत बातचीत के जरिए समाधान निकालने के हर प्रयास का समर्थन करेगा और इस लंबे समय से चल रहे संघर्ष की शीघ्र समाप्ति के पक्ष में है।

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