वैश्विक मंच पर फिर दोहराए पुराने दावे, दावोस से यूरोप को सख्त संदेश
दावोस में ट्रंप का आक्रामक संबोधन, अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर दिए बड़े बयान
विश्व आर्थिक मंच की वार्षिक बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर ऐसे बयान दिए, जिन पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है। स्विट्जरलैंड के दावोस में आयोजित विश्व आर्थिक मंच के विशेष सत्र को संबोधित करते हुए ट्रंप ने दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच संभावित युद्ध को रोकने में अहम भूमिका निभाई थी। यह पहला मौका नहीं है जब ट्रंप ने इस तरह का दावा किया हो। इससे पहले भी वह कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह कहते रहे हैं कि उनके हस्तक्षेप से दक्षिण एशिया में बड़ा टकराव टल गया।
भारत-पाक संबंधों पर ट्रंप का पुराना दावा फिर दोहराया
दावोस में अपने भाषण के दौरान ट्रंप ने कहा कि दुनिया को यह समझना चाहिए कि जब हालात बेहद तनावपूर्ण थे, तब उन्होंने शांति स्थापित करने के लिए पहल की। उनका कहना था कि भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु संपन्न देश हैं और यदि युद्ध होता तो इसके परिणाम सिर्फ क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक होते। हालांकि भारत पहले भी इस तरह के दावों को खारिज करता रहा है और स्पष्ट कर चुका है कि भारत-पाक मुद्दे द्विपक्षीय हैं तथा किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को स्वीकार नहीं किया जाता। इसके बावजूद ट्रंप का बार-बार इस दावे को दोहराना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है।
ग्रीनलैंड पर ट्रंप का फोकस, सुरक्षा को बताया सबसे बड़ा कारण
अपने संबोधन में ट्रंप ने ग्रीनलैंड को लेकर भी बेहद तीखे और स्पष्ट शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि ग्रीनलैंड कोई साधारण जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि बर्फ से ढका एक विशाल क्षेत्र है, जिसकी अहमियत इसके रणनीतिक स्थान के कारण है। ट्रंप के अनुसार यह क्षेत्र अमेरिका, रूस और चीन के बीच एक बेहद संवेदनशील भू-राजनीतिक स्थिति में स्थित है। उन्होंने कहा कि वैश्विक सुरक्षा के लिए अमेरिका के पास ग्रीनलैंड का होना जरूरी है।
रणनीतिक स्थान और दुर्लभ खनिजों का महत्व
ट्रंप ने अपने भाषण में यह भी कहा कि ग्रीनलैंड लगभग पूरी तरह से निर्जन और अविकसित है, लेकिन आने वाले समय में इसकी भूमिका बेहद अहम होने वाली है। उनका कहना था कि दुर्लभ पृथ्वी धातुओं की वैश्विक मांग लगातार बढ़ रही है और ग्रीनलैंड में इन संसाधनों की मौजूदगी इसे और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। ट्रंप ने जोर देकर कहा कि अमेरिका को ग्रीनलैंड की जरूरत किसी विस्तारवादी सोच के तहत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा के हितों के लिए है।
‘यह उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है’, ट्रंप का नया तर्क
ट्रंप ने अपने भाषण में यह दावा भी किया कि ग्रीनलैंड भौगोलिक रूप से उत्तरी अमेरिका का हिस्सा है और इसी वजह से यह अमेरिका का क्षेत्रीय हित बनता है। उन्होंने कहा कि यदि अमेरिका अपनी और अपने सहयोगियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर है, तो उसे इस क्षेत्र पर विशेष ध्यान देना ही होगा। ट्रंप के इस बयान ने एक बार फिर यह संकेत दिया कि वह ग्रीनलैंड को लेकर अपने पुराने रुख से पीछे हटने वाले नहीं हैं।
यूरोप को खुली चेतावनी, ‘हां’ या ‘न’ का विकल्प
दावोस में ट्रंप का सबसे सख्त लहजा यूरोप को लेकर देखने को मिला। उन्होंने कहा कि अमेरिका दुनिया की सुरक्षा के लिए सिर्फ एक बर्फीला इलाका चाहता है, लेकिन यूरोप उसे देने को तैयार नहीं है। ट्रंप ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अगर यूरोप उनकी बात मानता है तो अमेरिका आभारी रहेगा, लेकिन अगर उसने इनकार किया तो अमेरिका इसे याद रखेगा। उनके इस बयान को यूरोप पर राजनीतिक और रणनीतिक दबाव बनाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
नाटो और अमेरिकी सैन्य ताकत का जिक्र
ट्रंप ने अपने भाषण में नाटो का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि एक मजबूत और सुरक्षित अमेरिका का मतलब एक मजबूत नाटो है। इसी सोच के तहत वह अमेरिकी सेना को लगातार और ताकतवर बनाने के लिए काम कर रहे हैं। ट्रंप ने यह भी इशारा किया कि अमेरिका अपने सहयोगियों की सुरक्षा के लिए भारी खर्च करता है और इसके बदले वह सहयोगियों से भी स्पष्ट समर्थन की उम्मीद करता है।
वैश्विक राजनीति में ट्रंप के बयान क्यों हैं अहम
ट्रंप के ये बयान ऐसे समय में आए हैं, जब दुनिया पहले ही रूस-यूक्रेन युद्ध, मध्य पूर्व तनाव और एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा से जूझ रही है। भारत-पाक मुद्दे पर उनका दावा, ग्रीनलैंड को लेकर आक्रामक रुख और यूरोप को दी गई चेतावनी यह दिखाती है कि ट्रंप वैश्विक राजनीति को सुरक्षा और रणनीतिक हितों के चश्मे से देखते हैं। दावोस जैसे मंच से दिए गए इन बयानों का असर सिर्फ कूटनीतिक चर्चाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि आने वाले समय में अमेरिका-यूरोप संबंधों और वैश्विक शक्ति संतुलन पर भी दिखाई दे सकता है।
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