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डाॅ. विशेष गुप्ता
पूर्व प्राचार्य एवं प्रोफेसर, समाजशास्त्र
निवर्तमान अध्यक्ष,उत्तर प्रदेश बाल अधिकार संरक्षण आयोग

भारतीय संस्कृति में प्रेम कर्तव्य, मर्यादा और दीर्घकालिक सीमाओं से जुड़ा रहा है

वेलेन्टाइन डे पर आर्चीज के महंगे कार्डस, गुलाब के फूलों की दुनिया, होटल, रेस्ट्रा, पब यहां तक कि सार्वजनिक स्थान भी अब प्रेम के बाजार की कहानी खुद ही वयां कर रहे हैं। बहरहाल वेलेंटाइन डे को आप चाहें इसे पसंद करें या न करें, यह दिवस  युवाओं के लिए एक विशाल उत्सव बन चुका है। इस उत्सव का कड़वा सच यह है कि यह अब 28 हजार करोड़ रुपयों से भी अधिक का बाजार बन चुका है। अगले सालों में यह बाजार 30 हजार करोड़ रुपयों के होने का अनुमान है। इस कुल खर्च में ज्वैलरी,डेट,डिनर,चाॅकलेट और उपहार इत्यादि पर सर्वाधिक खर्च किया गया। यह दिवस अब केवल उपहारों के आदान-प्रदान तथा प्रेम के मासूम पलों की साझेदारी का ही नहीं रह गया है, बल्कि अब यह प्रेम के स्थान पर खुली संस्कृति की अभिव्यक्ति का दिवस भी बन रहा है। इसी बजह से समय रहते इस वेलेंटाइन डे से जुड़े मनोविज्ञान पर दृष्टिपात करना समय की मांग अनुभव हो रही है।

कहना न होगा कि हर वर्ष 14 फरवरी आते ही वेलेंटाइन डे के पक्ष में वैश्विक युवा संस्कृति का खुमार एवं विपक्ष में समाज की भौंहे चढ़नी शुरू हो जाती हैं। परन्तु इस प्रकार के दिवसों के पीछे हम कभी उस विचारधारा को समझने का प्रयास नहीं करते जो विचाराधारा इस प्रकार के दिवसों पर अपनी भूमिका अदा करती है। दरअसल यह वह विचारधारा है जो लोगों में घटते प्रेम व वात्सल्य के एहसास को उदारीकृत बाजार से प्राण वायु लेकर विस्तार देने का प्रयास कर रही है। जरा इतिहास में झांकने की कोशिश करें तो हमें उस संत वेलेंटाइन के बारे में कोई पुष्ट जानकारी प्राप्त नहीं होती जिसके नाम पर यह वेलेंटाइन डे मनाया जाता है। 14 फरवरी के साथ सीधे तौर पर एक मान्यता यह जुड़ी है कि वेलेंटाइन नामक पादरी को उस समय के यूनानी शासक क्लाउडियस ने ईसा के मत के प्रचार के अपराध में जेल में डाल दिया और इस दिन उसे मृत्युदण्ड देते हुए उसका सिर धड़ से अलग कर दिया था। ऐसा माना जाता है कि जिस दिन उसे मौत के घाट उतारा गया उसी रात उसकी मृत्यु से पहले उसने जेलर की बेटी को अलविदा का एक पत्र लिखा था, जिसके अन्त में उसने लिखा था ‘तुम्हारा वेलेंटाइन’। ऐसी सम्भावना है कि उसे उस लड़की से प्यार हो गया था। तभी से दण्डित किये गये सेंट वेलेंटाइन के मार्मिक और अपूर्ण रहे प्रेम की स्मृति में यह दिवस मनाया जाता है। इसी के साथ दूसरी मान्यता यह भी जुड़ी है कि वेलेंटाइन जब जेल में था तो उसे रोम के बच्चों के असंख्य पत्र प्राप्त हुए थे जो उसे बेतहाशा प्यार करते थे। कुछ इस दिवस की जड़ें उस पुरानी यूरोपीय लोकमान्यता के भीतर भी तलाशते हैं जहां यह धारणा उन दिनों खूब प्रचलित थी कि चौदह फरवरी के दिन संसार भर की सभी प्रजातियों के पक्षी चौदह अपना जोड़ा बनाकर प्रेम की अभिव्यक्ति करते हैं।

वेलेंटाइन डे से जुड़ा इतिहास व किंवदन्तियां चाहें जो भी हों। परन्तु इतना अवश्य है कि कहीं न कहीं यह दिवस प्रेम की प्राकृतिक भावनाओं को संजोते हुए श्रृंगार को अभिव्यक्त करने का दिवस है। हम जिस समाज में रह रहे हैं वह समाज अब प्रतिस्पर्धा से जुड़े वैश्विक व उदारीकृत समाज की शक्ल ले रहा है। परन्तु यह भी कड़वी सच्चाई है कि भारतीय समाज को विदेशी बाजारों के लिए खोल देने के बाद पश्चिमी संस्कृति का प्रवेश यहां आक्रामक रुप से सामने आ रहा है। इस सच्चाई से भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि वेलेंटाइन डे जैसे उत्सव हमारी अपनी स्वदेशी संस्कृति से मेल नहीं खाते। परन्तु इस बेमेल संस्कृति को भारत में लाने के लिए उन्हीं नीति निर्धारकों का महत्वपूर्ण हाथ रहा है जो नब्बे के दशक में खुले बाजार के हिमायती तो रहे हैं,परन्तु आज उससे बचने का प्रयास कर रहे हैं। अर्थात इसके लिए हम खुद ही उत्तरदायी हैं। आज के बच्चे यदि इस संस्कृति को अपनाने, रेव पार्टियों के आयोजित करने अथवा वेलेंटाइन डे के प्रति समर्पण करने में जो अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, उसमें परिवारों की घटती भूमिका प्रमुख रूप से उत्तरदायी है। कड़वा सत्य यह है कि बच्चों के व्यक्तित्व के विकास में परिवारजनों की घटती भूमिकाऐं, बच्चों के मध्य पारिवारिक साझेदारी एवं उनसे प्रेम करने की भावना बच्चों में प्रेममय सुख एवं सुरक्षा की भावना का संचार करती है।

घर का प्रेम व वात्सल्य बच्चों में एक प्रकार की सुरक्षा का आवरण प्रदान करता है। परन्तु अफसोस की बात यह है कि परिवार की स्नेह से परिपूर्ण वात्सल्यी संस्कृति के पीछे छूट जाने से बाल व किशोर मन की संवेदनाएं घायल अवस्था में हैं। उस पर मरहम लगाने का काम न तो परिवार कर रहे हैं और न ही स्कूल और स्कूली पाठ्यक्रम। व्यावसाियक सिनेमा ,दूरदर्शन के सीरियलों से जुड़े संवाद एवं पात्रों के दोहरे-तिहरे चरित्र का तीन चैथाई भाग भी प्रेम प्रसंगों से ही भरा रहता है। यही कारण है कि उन पात्रों के प्रेम प्रसंग किशोरों के जीवन को रोल माॅडल के रुप में सीधे  प्रभावित कर रहे हैं। इससे किशोर मनों की बर्जनाएं टूट रही हैं। व्यक्तिगत स्वतंत्रता बढ़ रही है, विवेक लुप्त हो रहा है और प्रेम के प्रसंग उनको तात्कालिक सुख की अनुभूति करा रहे हैं। दूसरे यह मीडिया संचार और सोशल मीडिया क्रान्ति का भी प्रभाव है कि इससे यौनगत आजादी का प्रसार तेजी से हुआ है तथा विवाह पूर्व यौन सम्बन्धों की अवधारणा निरन्तर विस्तार ले रही है। संदर्भवश विश्व स्वास्थ्य सर्वे और अध्ययन बताते हैं कि हंै कि भारत में प्रतिवर्ष 20 लाख किशोरियां गर्भधारण करतीं हैं। इनमें नौ लाख से अधिक गर्भपात 20 वर्ष से कम की आयु की किशोरियों द्वारा कराये जाते हैं। इन तथ्यों की गम्भीरता बताती है कि वैलेंनटाइन डे से लगातार विस्तारित होती हुयी खुली यौन स्वछन्दता की पृष्ठभूमि में छिपी इस घटना का अध्ययन करना भी प्रासंगिक होगा।

निश्चित ही वेलेंटाइन डे की भावना में कोई दोष नहीं है। दोष तो केवल एक दिवसीय उत्सव की उस संस्कृति में है, जो सारी बर्जनाओं को ध्वस्त करके एक बड़े बाजार की संस्कृति का हिस्सा बन रही है। भारतीय संस्कृति में प्रेम कभी भी प्रदर्शन का विषय नहीं रहा। यहां का प्रेम कर्तव्य,मर्यादा और दीर्घकालिक सीमाओं से जुड़ा रहा है। माता-पिता का त्याग,गुरु का मार्गदर्शन और जीवनसाथी का अटूट रिश्ता सदैव प्रेम और समर्पण का भाव अभिव्यक्त करते रहे हैं। इसलिए यदि वेलेंटाइन डे के वर्तमान विस्तारित स्वरूप को रोकना है तो हमें अपने परिवारों के स्नेह व प्रेम से बंचित होती संस्कृति पर भी  भी दृष्टिपात करना पड़ेगा। परिवारों में हमें झांककर यह भी देखना पड़ेगा कि कहीं हमारा बच्चों से भावनात्मक व रागात्मक अलगाव उन्हें  प्रेम की इस अंधी गली की ओर तो नहीं ले जा रहा। कहीं हमारी खुदगर्जी व मौज मस्ती का हमारा निजी जीवन बच्चों का रोल माॅड़ल बनकर उन्हें अपरिपक्व प्रेम की ज्वाला में तो नहीं झोंक रहा है। यदि हमें इस युवा पीढ़ी के बीच विस्तार लेती इस प्रकार के भौंड़ी संस्कृति को रोकना है तो हमें बच्चों के बीच पनपने वाले अधकचरे प्रेम को अपने स्नेहिल आंचल की छांव देनी होगी। तभी इस एक दिवसीय बाजारू प्रेम की संस्कृति से बच्चों का बचाव किया जा सकता है। 

आइये हम सब मिलकर इस वेलेन्टाइन डे की संस्कृति को स्वदेशी स्वरुप प्रदान करते हुए इसे मां-बाप और बच्चों,शिक्षक व शिक्षार्थी,गुरु व शिष्य के बीच घटते प्रेम,वात्सल्य व संवाद की संस्कृति के साथ-साथ क्षरण होते हुए नैसर्गिक प्रेम को सम्मान,संवेदना,सुरक्षा और आत्मसम्मान से भरने का प्रयास  करें। आज चुप्पी समाधान नहीं है। बल्कि बच्चों के मध्य सघन संवाद की संस्कृति,निरन्तर उनका मार्गदर्शन और उनसे भावनात्मक जुड़ाव करते हुए वेलेन्टाइन डे की बाजारु संस्कृति से बचा जा सकेगा।

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