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वरिष्ठ पत्रकार सुदेश गौड़
'यहूदी समुदाय इजराइल में रहता जरूर है पर उनकी रूह भारत में बस्ती है'
केरल के कोच्चि (मट्टनचेरी के ज्यू टाउन) में स्थित 458 वर्ष पहले स्थापित परदेसी सिनेगॉग भारत ही नहीं बल्कि पूरे कॉमनवेल्थ क्षेत्र के सबसे प्राचीन सक्रिय यहूदी धार्मिक स्थलों में से एक है। यह सिनेगॉग केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक सहिष्णुता, समुद्री व्यापार इतिहास और भारत-इजराइल संबंधों की गहरी जड़ों का प्रतीक भी है। विशेष रूप से आज जब पश्चिम एशिया में संघर्ष की परिस्थितियां बनी हुई हैं, तब यह स्थल भारत और यहूदी समुदाय के बीच सदियों पुराने विश्वास और मैत्री का ऐतिहासिक प्रमाण बनकर सामने आया है।
परदेसी सिनेगॉग का निर्माण 1568 में स्पेन और पुर्तगाल से आए सेफार्डिक यहूदियों ने किया था। इसे “परदेसी” इसलिए कहा गया क्योंकि इसे विदेशों से आए यहूदियों ने बनाया था। यह निर्माण कोच्चि के महाराजा द्वारा दी गई भूमि पर हुआ था, जो उस समय केरल की धार्मिक सहिष्णुता का उदाहरण था।
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दरअसल, केरल में यहूदियों का इतिहास इससे भी कहीं अधिक प्राचीन है। इतिहासकारों के अनुसार यहूदी व्यापारी पहली शताब्दी ईस्वी के आसपास मालाबार तट पर पहुँचे और बाद में क्रंगनूर (कोडुंगल्लूर) से कोच्चि आकर बस गए।
हालाँकि 1662 में पुर्तगालियों ने इस सिनेगॉग को आंशिक नष्ट कर दिया था, लेकिन डच शासन के समय इसे पुनः निर्मित किया गया और यहूदी समुदाय का स्वर्णकाल आरंभ हुआ।
स्थापत्य और सांस्कृतिक विशेषताएँ
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परदेसी सिनेगॉग केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि स्थापत्य कला के कारण भी अद्वितीय है।
चीनी मिट्टी की हाथ से चित्रित टाइलें, जो चीन से मंगाई गई थीं इसकी एक प्रमुख विशेषता है। इसकी विशिष्टता के कई और कारण भी है जैसे बेल्जियम के क्रिस्टल झूमर, डच शैली का घड़ी टॉवर, जिसमें रोमन, हिब्रू, मलयालम और अरबी अंक हैं।सागौन की लकड़ी से बना तोराह आर्क और चांदी सोने से सजाए गए धार्मिक ग्रंथ आज भी यहूदियों के लिए आकर्षण और श्रद्धा का केंद्र है।
यहूदी समुदाय की ऐतिहासिक पहचान
बीसवीं सदी के मध्य में जब 1948 में इजराइल की स्थापना हुई, तब केरल के अनेक यहूदी परिवार इजराइल चले गए। इसके बावजूद उनके सांस्कृतिक और भावनात्मक संबंध कोच्चि से बने रहे और आज भी इजराइल में बसे कोचीन मूल के यहूदी इस सिनेगॉग को अपनी ऐतिहासिक पहचान मानते हैं। भारत में लंबे समय तक रहने के कारण यहूदी परिवारों ने भारतीय संस्कृति को पूरी तरह आत्मसात कर लिया है और उन्हें हिंदी भी अच्छी तरह से आती है।
इसराइल के पोर्ट सिटी हाइफा से भारत आए एक यहूदी परिवार हन्नाह और साइमन से सिनेगॉग में हिंदी में जब चर्चा हुई तो उन्होंने बताया की उनकी मां मराठी थी इसलिए उन्हें हिंदी और मराठी भी पूरे तरीके से आती है। उन्हें आज भी भारत अपना ही देश लगता है।हन्नाह बताती हैं कि दुनिया के अनेक हिस्सों में यहूदियों को उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, लेकिन भारत में उन्हें सदैव सम्मान और सुरक्षा मिली। उन्होंने कहा कि हम इजराइल में रहते जरूर हैं पर हमारी आत्मा भारत में बसती है।
आज जब पश्चिम एशिया में संघर्ष और राजनीतिक तनाव देखने को मिलते हैं, तब कोच्चि का यह सिनेगॉग एक अलग संदेश देता है।यह दर्शाता है कि विभिन्न धर्म और संस्कृतियां शांतिपूर्वक सहअस्तित्व में रह सकती हैं। भारत की “सर्वधर्म समभाव” की परंपरा को वैश्विक स्तर पर प्रमाणित करता है। कोच्चि का परदेसी सिनेगॉग केवल एक प्राचीन धार्मिक भवन नहीं, बल्कि सभ्यताओं के संवाद का जीवंत स्मारक है। यह भारत की उदारता, केरल की बहुसांस्कृतिक विरासत और भारत-इजराइल के ऐतिहासिक संबंधों का प्रतीक है।जब दुनिया में धार्मिक और राजनीतिक संघर्ष बढ़ रहे हैं, तब कोच्चि का यह शांत प्रार्थना स्थल हमें यह याद दिलाता है कि सहिष्णुता, संवाद और सांस्कृतिक सम्मान ही स्थायी शांति का मार्ग है।
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