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वरिष्ठ पत्रकार सुदेश गौड़

राष्ट्र की छवि धूमिल करने का कुत्सित प्रयास

दिल्ली में चल रही वैश्विक एआई समिट केवल एक तकनीकी सम्मेलन नहीं, बल्कि उभरते और बदलते भारत की बौद्धिक शक्ति, डिजिटल क्षमता और वैश्विक नेतृत्व के दावे का गौरवशाली प्रदर्शन है। ऐसे समय में जब दुनिया भारत को कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में महाशक्ति के रूप में देख रही है, तब सड़कों पर उतरकर अंतरराष्ट्रीय मंच को राजनीतिक अखाड़ा बना देना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि राष्ट्रहित के प्रतिकूल भी है। लोकतंत्र विरोध की अनुमति देता है, परंतु विरोध और विघटन में फर्क होता है। जब देश की राजधानी में वैश्विक प्रतिनिधि मौजूद हों, निवेशक और तकनीकी दिग्गज भारत की नीतियों को परख रहे हों, तब योजनाबद्ध ढंग से किया गया निर्लज्ज प्रदर्शन यह संदेश देता है कि कुछ राजनीतिक शक्तियां देश की सामूहिक उपलब्धियों को भी दलगत चश्मे से ही देखती हैं।

कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी का हालिया राजनीतिक आचरण इस प्रश्न को और गहरा करता है। विदेश यात्राओं के दौरान भारत की संप्रभुता, लोकतांत्रिक संस्थाओं, न्यायपालिका और नीतिगत ढांचे पर सार्वजनिक मंचों से की गई टिप्पणियाँ पहले ही अंतरराष्ट्रीय विमर्श में विवाद पैदा कर चुकी हैं। अब एआई समिट जैसे वैश्विक मंच पर निर्लज्ज प्रदर्शन उसी श्रृंखला की एक और कड़ी है जिसकी स्पष्ट मंशा यह है कि यदि केंद्र सरकार सफल हो रही है, तो उसे किसी भी तरह विवादों में घेरो।

यह पहली बार नहीं है जब वैश्विक आयोजन के दौरान देश की छवि पर आघात पहुंचाने वाली घटनाएँ सामने आई हों। 2020 में जब अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत दौरे पर आए थे, तब भी दिल्ली में हिंसक घटनाएँ हुईं, जिनकी छाया अंतरराष्ट्रीय मीडिया में लंबे समय तक रही। आज फिर वही प्रश्न उठ रहा है — क्या हर वैश्विक अवसर पर देश को अस्थिर और विभाजित दिखाने की प्रवृत्ति राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन चुकी है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप इकोसिस्टम और टेक्नोलॉजी कूटनीति के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। यही कारण है कि एआई समिट जैसे आयोजन संभव हो पा रहे हैं। लेकिन जब विपक्ष इस उपलब्धि को स्वीकारने के बजाय उसे बाधित करने का रास्ता चुनता है, तो यह लोकतांत्रिक असहमति नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अवसरों का राजनीतिक अवमूल्यन प्रतीत होता है।

भारत विरोधी शक्तियों और तथाकथित “डीप स्टेट” जैसे विमर्शों पर बहस अलग विषय है, परंतु यह निर्विवाद है कि जब देश के भीतर से ही अस्थिरता का दृश्य निर्मित किया जाता है, तो बाहरी ताकतों को नैरेटिव गढ़ने का अवसर मिल जाता है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर छवि निर्माण वर्षों की मेहनत से होता है, पर उसे धूमिल करने में कुछ क्षण ही पर्याप्त होते हैं। राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, पर राष्ट्र की प्रतिष्ठा सर्वोपरि होनी चाहिए। विपक्ष यदि वास्तव में लोकतंत्र की रक्षा का दावा करता है, तो उसे यह भी समझना होगा कि लोकतंत्र की साख वैश्विक मंचों पर मजबूत दिखने से ही बढ़ती है, कमजोर दिखाने से नहीं। राष्ट्र निर्माण के क्षणों में राजनीति की सीमाएँ तय करनी होती हैं क्योंकि देशहित सदैव ही दलगत हितों से ऊपर होता है।

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