डॉ. लोकेंद्र सिंह लेखक,
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय
पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय
में सहायक प्राध्यापक
सभी भारतीय भाषाएं, राष्ट्रीय भाषाएं हैं।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने सदैव भारतीय भाषाओं के संरक्षण, संवर्धन और उनके एकात्म पर जोर दिया है। संघ ने सभी भारतीय भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा माना है, जो भारत की समृद्ध संस्कृति की संवाहिकाएं हैं। द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर देश की सभी भाषाओं को चिरजीवी मानते थे। आम समाज से लेकर राजकाज के व्यवहार में मातृभाषा का उपयोग होना चाहिए, इसके वे प्रबल पक्षधर थे। इस संदर्भ में वे छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण देते थे। विशेषरूप से छत्रपति शिवाजी महाराज के उदाहरण से उन लोगों को सीखना चाहिए जो आज कहते हैं कि हमारे दैनिक व्यवहार में अंग्रेजी और अन्य बाह्य भाषाओं का प्रभाव इतना अधिक बढ़ गया है कि अब उन्हें हटाना संभव नहीं है। श्रीगुरुजी कहते थे– “राज्य स्थापना के बाद छत्रपति शिवाजी महाराज ने सामान्य व्यवहार में घुसे फारसी, अरबी शब्दों को निकालने का काम किया। उस समय की स्थिति का विचार करने पर दिखाई देगा कि फारसी, अरबी के बिना काम ही नहीं चलता था। छत्रपति छत्रपति शिवाजी महाराज ने मिलावट की प्रवृत्ति को दूर करने और अपनी भाषा को शुद्ध रूप में लाने का प्रयत्न किया। उनके काल का ‘राज्य व्यवहार-कोश’ प्रसिद्ध है”।
हमारे सामने छत्रपति शिवाजी महाराज का उदाहरण था लेकिन इसके बाद भी स्वाधीनता के बाद हमारे सत्ताधीशों ने अंग्रेजी के सामने घुटने टेक दिए। दुनिया में कई देशों के उदाहरण हैं, जिन्होंने सत्ता के सूत्र संभालते ही अपनी भाषा में राजकाज किया। मातृभाषा के प्रति गौरव का भाव जगाते समय श्रीगुरुजी भी ऐसे देशों का उदाहरण देते थे। उनका स्पष्ट मत था कि जो देश अंग्रेजों की दासता से मुक्त हुए, उन सभी देशों ने अपने देश की भाषाओँ को ग्रहण किया। ब्रह्मदेश ने ब्रह्मी और श्रीलंका ने सिंहली को स्वीकार किया। सत्ता हाथों में आते ही उन्होंने भाषा बदल दी। दक्षिण अफ्रीका में विभिन्न 14-16 भाषाएँ हैं तथा प्रत्येक समुदाय को अपनी भाषा पर गर्व है। फिर भी सर्वसम्मति से उन्होंने ‘स्वाहिली’ भाषा को राष्ट्रीय भाषा के रूप में ग्रहण किया। उनका सब-कुछ ठीक चल रहा है। इस संबंध में इजराइल और तुर्की के उदाहरण भी प्रेरक हैं।
भारतीय भाषाओं के लेकर संघ का दृष्टिकोण बहुत व्यापक है। यही कारण है कि संघ ने समय–समय पर अपनी भाषाओं के संदर्भ में समाज और सरकार का प्रबोधन किया है। जब राजनीति स्वार्थों के चलते देश में भारतीय भाषाओं को आपस में लड़ाने–भिड़ाने का अपराध किया जा रहा था, तब संघ ने भाषाई समन्वय का आग्रह किया। संघ की सर्वोच्च ईकाइ ‘अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा’ ने 1958 में ‘राष्ट्रीय भाषा–नीति’ प्रस्ताव पारित किया, जिसमें कहा गया है– “यह अत्यंत दुर्भाग्य का विषय है की राजभाषा के विवाद में पड़े कुछ लोग हटवादिता से अपना संतुलन खो बैठे हैं और राष्ट्रजीवन में विषाक्त वातावरण उत्पन्न कर रहे हैं। आज की यह स्थिति सरकार द्वारा संविधान में निर्देशित तत्वों का पालन न किए जाने से ही उत्पन्न हुई है।
संघ का स्पष्ट मत है कि किसी भी स्वतंत्र देश का कामकाज किसी भी विदेशी भाषा में नहीं चलाया जा सकता। जब तक भारत अपने सामान्य एवं राज्य व्यवहार के लिए अंग्रेजी का उपयोग करता रहेगा वह मानसिक दासता से मुक्त नहीं हो सकता। उसके कारण शासन और जनता के बीच खाई बनी रहेगी”। उल्लेखनीय है कि जब अन्य देश स्वतंत्रता के बाद अपनी भाषा में राजकाज चला सकते हैं, तब हमारे सामने क्या संकोच था? यदि कोई यह तर्क देता है कि भारत में अनेक भाषाएं हैं, इसके कारण यह संभव नहीं है। यदि ऐसा है तब अंग्रेजी में राजकाज कैसे चल सकता है? अंग्रेजी का विरोध क्यों नहीं? यही औपनिवेशिक मानसिक दासता की निशानी है। इससे मुक्त हुए बिना हमारा कल्याण नहीं हो सकता।
शासन की भाषा–नीति क्या होनी चाहिए? इस संदर्भ में संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने 1963 में एक बार फिर प्रस्ताव पारित किया। संघ ने चिंता व्यक्त की– “यह दुर्भाग्य की बात है कि हमारी स्वतंत्रता के 16 वर्ष पश्चात भी देश के प्रशासन में अंग्रेजी प्रभुत्व के स्थान पर बैठी हुई है। हमारे पास कई राष्ट्रीय भाषाएं होने के बाद भी हमारे शासन की कोई भाषा–नीति नहीं है”। वर्ष 1965 में संघ की प्रतिनिधि सभा ने ‘भाषा–नीति’ के शीर्षक से देश के समक्ष प्रस्ताव रखा कि स्वतंत्रता की यह मांग है कि “देश का प्रशासन हमारी अपनी भाषा में चलाया जाए। विदेशी भाषा राष्ट्र की प्रतिभा को अभिव्यक्त नहीं कर सकती, न ही उसके विकास में सहायक हो सकती है”।
इस प्रस्ताव में संघ ने स्पष्टतौर पर दोहराया है कि भारत की सभी मातृभाषाएं राष्ट्रीय हैं, सभी को समान स्तर मिले, किसी के साथ अन्याय न हो। हिन्दी केन्द्र में और क्षेत्रीय भाषाएँ अपने-अपने प्रान्त में प्रशासनिक भाषा के रूप में प्रयुक्त हों। उनका प्रयोग तुरन्त प्रारम्भ हो। अंग्रेजी के प्रभुत्व के कारण हमारी भाषाओं के सामने कितने प्रकार के संकट खड़े हो गए हैं, इससे हम सब अवगत हैं। संघ ने कभी भी इस चिंता से मुंह नहीं मोड़ा। वर्ष 2015 एवं 2018 में भी प्रतिनिधि सभा ने ‘भारतीय भाषाओं के संरक्षण’ पर आवश्यक प्रस्ताव पारित किए। मातृभाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन के प्रभावी उपाय इन प्रस्तावों में संघ ने समाज और सरकार के सामने विचारार्थ रखे हैं। यह सुखद है कि संघ के निरंतर प्रयासों का परिणाम सबदूर दिखाई देने लगे हैं। नागरिक भी अपनी भाषाओं को लेकर सजग हुए हैं और सरकार ने भी इस दिशा में सराहनीय प्रयास किए हैं।
वर्तमान सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत भी अकसर भारतीय भाषाओं पर संघ के दृष्टिकोण को समाज के सम्मुख रखते हुए कहते हैं। श्रीगुरुजी की भाँति सरसंघचालक डॉ. भागवत भी आग्रह करते हैं कि हमें अपनी मातृभाषा के साथ–साथ भारत की कोई अन्य भाषा भी सीखनी चाहिए। कामकाज की दृष्टि से हम सब संपूर्ण भारत में प्रवास करते हैं। नौकरी के लिए अलग–अलग स्थानों पर जाकर लंबे समय तक रहते भी हैं। ऐसे में होना यह चाहिए कि हम अपनी मातृभाषा के संरक्षण के साथ–साथ अपनी वहाँ की भाषा को सीखें और बोलें। कुल मिलाकर कहना चाहिए कि संघ भारतीय भाषाओं के संरक्षण का पक्षधर है। वह सभी भाषाओं को राष्ट्रीय भाषा मानता है।
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