120 एकड़ में आकार ले रहा विराट रामायण मंदिर, धार्मिक-सांस्कृतिक पहचान को मिलेगा वैश्विक विस्तार

मोतिहारी जिले के पूर्वी चंपारण अंतर्गत कल्याणपुर प्रखंड के कैथवलिया स्थित जानकी नगर में निर्मित हो रहा विराट रामायण मंदिर आज एक ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बनने जा रहा है। शनिवार को मंदिर की पूर्ण रूप से तैयार आधार पीठ पर देवाधिदेव महादेव के सहस्त्रलिंगम की विधिवत स्थापना की जाएगी। इसे विश्व का सबसे विशाल सहस्त्रलिंगम बताया जा रहा है, जिसकी भव्यता, आकार और धार्मिक महत्व इसे वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस पावन अवसर पर देश के विभिन्न राज्यों से श्रद्धालु, संत और आचार्य जानकी नगर पहुंच चुके हैं और पूरे क्षेत्र में धार्मिक उत्साह और आध्यात्मिक ऊर्जा का वातावरण व्याप्त है।

विराट रामायण मंदिर का निर्माण कार्य बीते करीब डेढ़ वर्षों से निरंतर प्रगति पर है। मंदिर की नींव को असाधारण रूप से मजबूत बनाने के लिए महावीर मंदिर न्यास समिति के मार्गदर्शन में अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया है। मंदिर की आधार संरचना के लिए जमीन के भीतर 100 फीट गहराई तक कुल 3102 मजबूत स्तंभ तैयार किए गए, जिनकी भार वहन क्षमता की तकनीकी जांच के बाद नींव से लेकर आधार पीठ तक का निर्माण पूरा किया गया। इस कार्य को पूरा करने में निर्माण एजेंसी सनटेक इंफ्रा सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड को लगभग डेढ़ वर्ष का समय लगा। इस दौरान प्रतिदिन औसतन दो से ढाई सौ श्रमिकों ने लगातार श्रमदान किया, जिसका परिणाम आज इस भव्य आधार पीठ के रूप में सामने आया है।

आज स्थापित किया जाने वाला सहस्त्रलिंगम अपने आप में अद्वितीय है। शिवलिंग की ऊंचाई और गोलाई 33 फीट है और इसका वजन लगभग 200 टन बताया जा रहा है। यह विशाल शिवलिंग न केवल स्थापत्य कौशल का उदाहरण है, बल्कि श्रद्धा और आस्था का भी प्रतीक है। माना जा रहा है कि सहस्त्रलिंगम की स्थापना के साथ ही यह स्थल देश-विदेश के श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख तीर्थ केंद्र के रूप में उभरने लगेगा।

करीब 120 एकड़ में फैले विराट रामायण मंदिर परिसर की परिकल्पना अत्यंत व्यापक और दिव्य है। पूरे परिसर में कुल 22 मंदिरों और 12 भव्य शिखरों का निर्माण प्रस्तावित है। मुख्य मंदिर की लंबाई 1080 फीट और चौड़ाई 540 फीट होगी, जो इसे स्थापत्य की दृष्टि से भी असाधारण बनाती है। मंदिर का सबसे ऊंचा शिखर 270 फीट ऊंचा होगा, जबकि अन्य शिखरों की ऊंचाई 190 फीट, 180 फीट, 135 फीट और 108 फीट निर्धारित की गई है। शिखरों की यह भव्य रचना दूर से ही श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करेगी।

मंदिर की एक विशेष और अनूठी विशेषता यह है कि यहां महादेव के साथ भगवान नारायण भी मुख्य मंदिर में विराजमान होंगे और वे महादेव के सन्मुख स्थापित किए जाएंगे। यह संयोजन सनातन परंपरा की उस समन्वित धारा को दर्शाता है, जिसमें शिव और विष्णु को एक ही सत्य के दो स्वरूप माना गया है। यही विशेषता विराट रामायण मंदिर को अन्य धार्मिक स्थलों से अलग पहचान दिलाने वाली है।

मंदिर परिसर तक ही यह परियोजना सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ जानकी नगर को एक समग्र धार्मिक और सांस्कृतिक नगर के रूप में विकसित करने की योजना है। इस नगर में गुरुकुल, धर्मशालाएं, साधना के लिए आश्रम तथा देवी सीता के सिद्धांतों और आदर्शों के अनुरूप जनकल्याण से जुड़े विशेष केंद्र स्थापित किए जाएंगे। इसका उद्देश्य केवल पूजा-अर्चना तक सीमित न रहकर शिक्षा, संस्कार और सेवा के माध्यम से समाज के व्यापक उत्थान की दिशा में कार्य करना है।

विराट रामायण मंदिर का स्थान भी इसे विशेष महत्व प्रदान करता है। यह मंदिर प्रभु श्रीराम की नगरी अयोध्या और माता सीता के धाम जनकपुर के बीच स्थित है। जिस भूखंड पर इसका निर्माण हो रहा है, उसका नामकरण जानकी नगर के रूप में किया गया है। अयोध्या से इस स्थल की दूरी लगभग 315 किलोमीटर, जनकपुरधाम से करीब 115 किलोमीटर और बिहार की राजधानी पटना से लगभग 120 किलोमीटर है। मंदिर वर्तमान केसरिया-चकिया पथ के किनारे स्थित है, जिसे रामजानकी पथ के रूप में उन्नत किया जा रहा है। इस मार्ग के पूर्ण होने के बाद अयोध्या से जनकपुरधाम तक जाने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह मंदिर एक प्रमुख आध्यात्मिक पड़ाव बन जाएगा।

20 जून 2023 को शिला पूजन के बाद से मंदिर निर्माण कार्य निरंतर जारी है। आज आधार पीठ के पूर्ण होने और सहस्त्रलिंगम की स्थापना के साथ यह परियोजना अपने अगले महत्वपूर्ण चरण में प्रवेश कर रही है। पहले से ही बड़ी संख्या में लोग परिसर की भव्यता को देखने के लिए पहुंच रहे हैं और आने वाले समय में इसके धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित होने की प्रबल संभावना जताई जा रही है।

विराट रामायण मंदिर न केवल पूर्वी चंपारण या बिहार, बल्कि पूरे देश के लिए आस्था, संस्कृति और स्थापत्य का एक नया प्रतीक बनने की ओर अग्रसर है। सहस्त्रलिंगम की स्थापना के साथ यह स्थल सनातन परंपरा की गौरवशाली विरासत को वैश्विक पटल पर स्थापित करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

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