जातिविहीन समाज के सवाल पर शीर्ष अदालत की चिंता, नियमों की अस्पष्टता पर उठाए गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के नए नियमों पर अगली सुनवाई तक रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने इन नियमों को लेकर कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि यह साफ नहीं है कि इनका उद्देश्य क्या है और इन्हें लागू करने से समाज किस दिशा में जाएगा। अदालत ने यह भी सवाल उठाया कि क्या देश अब जातिविहीन समाज की दिशा में आगे बढ़ रहा है या फिर उल्टी दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। यह टिप्पणी ऐसे समय में आई है जब देश के कई हिस्सों में इन नियमों के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन तेज हो चुके हैं।

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: सामाजिक संतुलन पर खतरे की आशंका

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने नए नियमों की भावना और उनके संभावित प्रभावों पर गहरी चिंता जताई। अदालत ने कहा कि समाज में समानता और स्वतंत्रता का वातावरण बनाना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यदि नियमों की भाषा और परिभाषा स्पष्ट नहीं होगी, तो उनके दुरुपयोग की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालय परिसरों में किसी भी तरह की ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए, जिससे छात्रों के बीच अलगाव या भेदभाव की भावना पैदा हो।

केंद्र सरकार को स्पष्ट संदेश: अलगाव को बढ़ावा न दें

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने केंद्र सरकार से कहा कि एससी और एसटी छात्रों के लिए अलग हॉस्टल जैसी बातों पर दोबारा विचार किया जाना चाहिए। अदालत का मानना है कि इस तरह की व्यवस्थाएं समानता के सिद्धांत के विपरीत जा सकती हैं। कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि आरक्षित वर्गों में भी अब ऐसे लोग हैं जो आर्थिक और सामाजिक रूप से मजबूत हो चुके हैं, जबकि कुछ अन्य वर्ग अभी भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में नियम बनाते समय व्यापक सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखना जरूरी है।

नियमों की अस्पष्ट परिभाषा पर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नए नियमों की परिभाषा पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। अदालत ने आशंका जताई कि यदि इन्हें इसी रूप में लागू किया गया, तो इसका गलत इस्तेमाल हो सकता है। कोर्ट ने संकेत दिए कि इस विषय पर विशेषज्ञों की राय लेकर नियमों में संशोधन किया जा सकता है। अदालत का जोर इस बात पर रहा कि विश्वविद्यालयों में ऐसा वातावरण बने, जहां सभी छात्र खुद को समान और स्वतंत्र महसूस करें।

देशभर में विरोध: दिल्ली से लखनऊ तक उबाल

UGC के नए नियमों को लेकर देशभर में विरोध लगातार बढ़ रहा है। गुरुवार को दिल्ली यूनिवर्सिटी के नॉर्थ कैंपस के बाहर बड़ी संख्या में छात्रों ने प्रदर्शन किया। छात्रों का कहना है कि ये नियम शिक्षा व्यवस्था को बांटने वाले हैं और इससे विश्वविद्यालयों में तनाव बढ़ेगा। वहीं उत्तर प्रदेश की लखनऊ यूनिवर्सिटी के न्यू कैंपस में विभिन्न छात्र संगठनों से जुड़े छात्र सड़क पर बैठकर नारेबाजी करते नजर आए। हालात को देखते हुए वहां भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

कानपुर में अनोखा विरोध, प्रदर्शन का अलग तरीका

कानपुर में UGC के नए नियमों के खिलाफ एक अनोखा विरोध देखने को मिला। भरत शुक्ला नाम के व्यक्ति ने नियमों के विरोध में सिर मुंडवाकर अपना आक्रोश जाहिर किया। उनका कहना है कि ये नियम समाज में पहले से मौजूद खाई को और गहरा कर सकते हैं। इस तरह के प्रतीकात्मक विरोध ने भी इस मुद्दे को और चर्चा में ला दिया है।

तमिलनाडु से समर्थन, एमके स्टालिन की अलग राय

जहां एक ओर देश के कई हिस्सों में विरोध हो रहा है, वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने UGC के नए नियमों का समर्थन किया है। उन्होंने सोशल मीडिया मंच X पर लिखा कि UGC नियम 2026 भले ही देर से उठाया गया कदम हो, लेकिन यह भेदभाव और उदासीनता से ग्रस्त उच्च शिक्षा व्यवस्था में सुधार की दिशा में एक सकारात्मक पहल है। स्टालिन के इस बयान के बाद यह मुद्दा राजनीतिक बहस का भी केंद्र बन गया है।

आगे क्या: नजरें अगली सुनवाई पर

सुप्रीम कोर्ट द्वारा रोक लगाए जाने के बाद अब सभी की नजरें अगली सुनवाई पर टिकी हैं। अदालत के रुख से यह स्पष्ट है कि बिना स्पष्टता और सामाजिक संतुलन के किसी भी नियम को लागू करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। वहीं केंद्र सरकार के लिए भी यह एक संकेत है कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में नियम बनाते समय सभी पक्षों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाना चाहिए।

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