टेबल पर कृत्रिम पैर रखकर बताया 31 साल पुराना दर्द, सदन में गरमाई सियासत
नई दिल्ली। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान सोमवार को राज्यसभा में उस समय भावुक और गंभीर माहौल बन गया, जब नामित सदस्य सी. सदानंदन मास्टर ने अपने जीवन से जुड़ा दर्दनाक अनुभव सदन के सामने रखा। उन्होंने कहा कि आज जो लोग संसद में बैठकर लोकतंत्र और मानवता की बातें कर रहे हैं, उन्हीं से जुड़ी राजनीति के कारण 31 वर्ष पहले उन पर जानलेवा हमला हुआ था। उसी हमले का परिणाम है कि वे आज व्हीलचेयर पर बैठकर सदन में बोलने को मजबूर हैं।
31 साल पुराना हमला और टूटी जिंदगी
सदानंदन मास्टर ने सदन को बताया कि उन पर हमला एक संगठित आपराधिक गिरोह ने किया था, जिसमें उनके दोनों पैर काट दिए गए। यह हमला तब हुआ, जब वह अपने चाचा के घर से लौट रहे थे। उन्होंने कहा कि यह केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं था, बल्कि यह विचारधारा और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हमला था। उन्होंने इस घटना का संबंध अपरोक्ष रूप से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से जोड़ते हुए कहा कि हमला करने वाले लोग ‘इंकलाब ज़िंदाबाद’ के नारे लगा रहे थे, जो उस समय की राजनीतिक हिंसा की मानसिकता को दर्शाता है।
कृत्रिम पैर दिखाकर सदन में उठाया सवाल
अपने वक्तव्य के दौरान सदानंदन मास्टर ने टेबल पर अपना कृत्रिम पैर रख दिया और कहा कि वे खड़े होकर क्यों नहीं बोल पा रहे हैं, इसका जवाब इसी में छिपा है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों की राजनीति हिंसा पर आधारित रही है, वे आज लोकतंत्र और मानवता की दुहाई दे रहे हैं। उन्होंने दो टूक कहा कि राजनीतिक हिंसा किसी भी रूप में लोकतंत्र के लिए घातक है और इससे समाज में डर, नफरत और अस्थिरता ही फैलती है।
बयान के बाद विपक्ष का विरोध
सदानंदन मास्टर के इस बयान के बाद सदन में विपक्षी सदस्यों ने आपत्ति जतानी शुरू कर दी। विशेष रूप से माकपा के सदस्य जॉन ब्रिटास ने प्वाइंट ऑफ ऑर्डर उठाते हुए कहा कि राज्यसभा में किसी भी वस्तु को प्रदर्शित करने की अनुमति नहीं है। उनका कहना था कि नियमों के तहत सदन में इस तरह किसी वस्तु को दिखाना अनुचित है।
सभापति का हस्तक्षेप
इस पर राज्यसभा के सभापति सी. पी. राधाकृष्णन ने हस्तक्षेप करते हुए कहा कि वह सदस्य से कृत्रिम अंग हटाने के निर्देश देंगे। सभापति के निर्देश के बाद सदानंदन मास्टर ने अपने कृत्रिम पैर को टेबल से हटा लिया और शांत भाव से अपना वक्तव्य आगे जारी रखा। इस दौरान सदन में गंभीर सन्नाटा छाया रहा।
विकसित भारत की परिकल्पना पर जोर
अपने संबोधन के अंतिम हिस्से में सदानंदन मास्टर ने कहा कि विकसित भारत किसी एक सरकार या एक पीढ़ी का लक्ष्य नहीं है। यह एक लंबी और निरंतर चलने वाली यात्रा है, जिसमें लोकतंत्र, संवाद और अहिंसा की भूमिका सबसे अहम है। उन्होंने कहा कि यदि राजनीति हिंसा की राह पर चलेगी, तो विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करना केवल दिखावा बनकर रह जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने राज्यसभा में राजनीतिक हिंसा के मुद्दे पर एक बार फिर गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। सदन के भीतर भावनाओं, नियमों और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच यह संदेश स्पष्ट रूप से उभरा कि लोकतंत्र की मजबूती संवाद से आती है, हिंसा से नहीं।
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