क्रिटिकल मिनरल्स से लेकर टैरिफ विवाद तक, उच्चस्तरीय बातचीत से समझौते की राह आसान
नई दिल्ली। विदेश मंत्री एस. जयशंकर चार फरवरी तक के लिए अमेरिका की यात्रा पर रवाना हो गए हैं। इस दौरे को भारत-अमेरिका संबंधों के लिहाज से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि ऐसे समय में यह यात्रा हो रही है जब दोनों देशों के बीच व्यापार, टैरिफ और रणनीतिक सहयोग को लेकर बातचीत निर्णायक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। विदेश मंत्रालय के अनुसार जयशंकर वाशिंगटन में आयोजित ‘क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल’ बैठक में भाग लेंगे और इसके साथ ही अमेरिकी प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारियों से कई अहम द्विपक्षीय बैठकें भी करेंगे।
क्रिटिकल मिनरल्स बैठक पर सबकी नजर
वाशिंगटन में होने वाली क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्टीरियल बैठक में सप्लाई चेन को मजबूत करने, स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण और महत्वपूर्ण खनिजों में रणनीतिक सहयोग बढ़ाने पर चर्चा होगी। मौजूदा वैश्विक हालात में दुर्लभ खनिजों और कच्चे संसाधनों की आपूर्ति को लेकर देशों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। ऐसे में भारत और अमेरिका का इस मंच पर एक साथ आना यह संकेत देता है कि दोनों देश भविष्य की ऊर्जा और औद्योगिक जरूरतों को लेकर साझा रणनीति बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
टैरिफ विवाद सुलझने के संकेत
जयशंकर के दौरे को केवल खनिज सहयोग तक सीमित नहीं देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इस यात्रा के दौरान भारत और अमेरिका के बीच टैरिफ को लेकर चल रहे मतभेदों पर भी गंभीर बातचीत होगी। हाल ही में वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने संकेत दिए थे कि दोनों देशों के बीच व्यापारिक सुलह की संभावनाएं बन रही हैं और एक नई डील को अंतिम रूप दिया जा सकता है। जयशंकर का तीन दिवसीय दौरा इन्हीं संकेतों को और मजबूती देता नजर आ रहा है।
व्यापार वार्ताओं की पृष्ठभूमि
भारत और अमेरिका के बीच लंबे समय से द्विपक्षीय व्यापार वार्ताएं चल रही हैं, लेकिन अमेरिकी प्रशासन द्वारा भारत पर 50 प्रतिशत तक टैरिफ लगाए जाने के बाद बातचीत में तनाव बढ़ गया था। इस फैसले ने दोनों देशों के कारोबारी संबंधों में असहजता पैदा की और वार्ताओं को और जटिल बना दिया। इसके बावजूद संवाद की प्रक्रिया बंद नहीं हुई और पर्दे के पीछे लगातार संपर्क बनाए रखा गया।
रूस से तेल आयात पर दबाव
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत पर यह दबाव भी बना रहे हैं कि वह रूस से तेल आयात को सीमित करे। यह मुद्दा केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ा है। भारत का रुख साफ रहा है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों और ऊर्जा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेता है। बावजूद इसके, इस संवेदनशील विषय पर भी भारत और अमेरिका के बीच बातचीत जारी है।
डील के लिए बनती सहमति
सूत्रों के अनुसार मौजूदा ढांचे के तहत कई अहम बिंदुओं पर दोनों देशों के बीच सहमति बन चुकी है। इन्हीं सहमतियों के आधार पर अब अंतिम समझौते का रास्ता साफ होता दिख रहा है। सरकार का फोकस ऐसा संतुलित समझौता तैयार करने पर है, जिससे भारत और अमेरिका दोनों को बराबर का लाभ मिल सके और किसी एक पक्ष पर अनुचित दबाव न पड़े।
एफटीए वार्ता और आगे की राह
वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि अमेरिका भारत का एक अहम व्यापारिक साझेदार है, लेकिन अन्य देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते की वार्ताएं अपेक्षाकृत तेज गति से आगे बढ़ रही हैं और कुछ समझौते इसी वर्ष पूरे होने की उम्मीद है। उन्होंने यह भी कहा था कि किसी भी व्यापारिक डील में दो पक्ष होते हैं और इसे आगे बढ़ाने के लिए दोनों की समान इच्छा जरूरी होती है। हाल ही में ट्रंप की ओर से भी भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों को लेकर सकारात्मक संकेत मिले हैं, जिससे उम्मीदें और बढ़ी हैं।
आर्थिक स्थिरता को मिलेगा सहारा
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के अनुसार यदि भारत-अमेरिका डील को अंतिम रूप मिल जाता है तो इससे भारत के बाहरी मोर्चे पर अनिश्चितता कम होगी और समग्र आर्थिक स्थिरता को मजबूती मिलेगी। निर्यात, निवेश और तकनीकी सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं, जिससे मध्यम और दीर्घकाल में अर्थव्यवस्था को लाभ मिलने की संभावना है। ऐसे में जयशंकर का यह दौरा केवल कूटनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक दिशा तय करने वाला कदम माना जा रहा है।
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