संसद से संसद तक संवाद बढ़ाने की रणनीति, सभी दलों के सांसदों को मिली जिम्मेदारी

नई दिल्ली में संसदीय कूटनीति को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए Om Birla ने 60 से अधिक देशों के साथ संसदीय मैत्री समूहों के गठन की घोषणा की है। इस पहल का उद्देश्य पारंपरिक राजनयिक माध्यमों के साथ-साथ संसद से संसद के बीच सीधे, नियमित और संस्थागत संवाद को बढ़ावा देना है। इसे भारत की लोकतांत्रिक कूटनीति को वैश्विक मंच पर और प्रभावशाली बनाने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।

संसदीय कूटनीति को नई मजबूती

लोकसभा अध्यक्ष ने कहा कि संसदीय मैत्री समूहों के माध्यम से भारत के सांसद अपने विदेशी समकक्षों से सीधे संवाद स्थापित कर सकेंगे। इससे द्विपक्षीय संबंधों को नई ऊर्जा मिलेगी और विभिन्न वैश्विक मुद्दों पर साझा समझ विकसित होगी। उन्होंने बल दिया कि संसद से संसद और जनता से जनता के बीच संपर्क बढ़ाना वर्तमान समय की आवश्यकता है।

यह पहल भारत की वैश्विक पहचान को मजबूत करने की दिशा में एक संगठित प्रयास है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाने के लिए संसदीय स्तर पर सक्रिय भागीदारी को आवश्यक बताया गया है।

सभी प्रमुख दलों की भागीदारी

इन संसदीय मैत्री समूहों में सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के सांसदों को शामिल किया गया है। इससे यह संदेश जाता है कि राष्ट्रीय हित और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रश्न पर भारत एकजुट है। वरिष्ठ नेताओं को विभिन्न देशों से संबंधित समूहों की जिम्मेदारी सौंपी गई है, ताकि अनुभव और विशेषज्ञता का लाभ द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करने में मिल सके।

इस व्यापक भागीदारी से यह स्पष्ट होता है कि यह पहल किसी एक दल तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक समन्वय और सामूहिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है।

किन देशों के साथ बने समूह

पहले चरण में जिन देशों के साथ मैत्री समूह गठित किए गए हैं, उनमें श्रीलंका, जर्मनी, न्यूज़ीलैंड, स्विट्ज़रलैंड, दक्षिण अफ्रीका, भूटान, सऊदी अरब, इज़राइल, मालदीव, अमेरिका, रूस, दक्षिण कोरिया, नेपाल, यूनाइटेड किंगडम, फ्रांस, जापान, इटली, ओमान, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीस, सिंगापुर, ब्राज़ील, वियतनाम, मेक्सिको, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। इसके अतिरिक्त यूरोपीय संसद के साथ भी संसदीय संवाद को संस्थागत स्वरूप देने की दिशा में कदम बढ़ाया गया है।

इन देशों का चयन भारत के रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संबंधों को ध्यान में रखते हुए किया गया है। आने वाले समय में अन्य देशों के साथ भी ऐसे समूह गठित किए जाने की प्रक्रिया जारी रहेगी।

किन विषयों पर होगा संवाद

इन मैत्री समूहों के माध्यम से व्यापार, प्रौद्योगिकी, कृषि, शिक्षा, संस्कृति, जलवायु परिवर्तन, सामाजिक नीतियों और वैश्विक चुनौतियों जैसे विषयों पर चर्चा की जाएगी। नियमित बैठकों, अध्ययन दौरों और संयुक्त कार्यक्रमों के जरिए दीर्घकालिक सहयोग को बढ़ावा देने की योजना है।

संसदीय स्तर पर इस प्रकार का संवाद न केवल नीतिगत समझ बढ़ाता है, बल्कि विभिन्न देशों के लोकतांत्रिक अनुभवों से सीखने का अवसर भी प्रदान करता है। इससे बहुपक्षीय मंचों पर सहयोग की संभावनाएं भी मजबूत होती हैं।

वैश्विक मंच पर भारत की एकजुट छवि

उल्लेखनीय है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद Narendra Modi ने विभिन्न देशों में बहुदलीय शिष्टमंडल भेजकर राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर भारत की एकजुटता का संदेश दिया था। उसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए लोकसभा अध्यक्ष की यह पहल वैश्विक मंच पर भारत की सशक्त, समावेशी और संवाद-आधारित लोकतांत्रिक छवि को और मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

यह कदम दर्शाता है कि भारत केवल कार्यपालिका स्तर पर ही नहीं, बल्कि विधायिका स्तर पर भी अंतरराष्ट्रीय सहयोग को प्राथमिकता दे रहा है। संसदीय मैत्री समूहों के माध्यम से भारत वैश्विक संवाद में सक्रिय भागीदारी निभाने के लिए तैयार है।

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