देहरादून में पूर्व सैनिकों के साथ संवाद, संघ की यात्रा और राष्ट्र निर्माण की भूमिका पर विस्तार से विचार
देहरादून में दो दिवसीय प्रवास पर पहुंचे Mohan Bhagwat ने स्पष्ट कहा कि Rashtriya Swayamsevak Sangh का उद्देश्य चुनावी राजनीति करना नहीं, बल्कि व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र को सशक्त बनाना है। उन्होंने कहा कि संघ किसी राजनीतिक दल का अंग नहीं है और न ही उसका लक्ष्य सत्ता प्राप्त करना है। संघ का कार्य समाज को संगठित करना और चरित्रवान व्यक्तियों का निर्माण करना है, क्योंकि जब व्यक्ति मजबूत होगा तभी व्यवस्था भी सुदृढ़ होगी।
पूर्व सैनिकों के साथ विशेष संवाद
देहरादून स्थित हिमालयन कल्चरल सेंटर के प्रेक्षागृह में आयोजित विशेष संवाद गोष्ठी में मोहन भागवत ने थलसेना, नौसेना, अर्धसैनिक बलों और अन्य सैन्य क्षेत्रों से सेवानिवृत्त पूर्व सैनिकों एवं अधिकारियों को संबोधित किया। उन्होंने संघ की स्थापना वर्ष 1925 से लेकर 2025 तक की यात्रा के प्रमुख पड़ावों का उल्लेख करते हुए बताया कि संघ बिना किसी बड़े संसाधन के खड़ा हुआ और दो बार प्रतिबंध झेलने के बावजूद समाज के समर्थन से निरंतर आगे बढ़ता रहा।
उन्होंने कहा कि संघ का स्वयंसेवक आत्मिक शक्ति से प्रेरित होकर समाज परिवर्तन के लिए कार्य करता है। संघ प्रचार पर नहीं, बल्कि संगठन और सेवा पर विश्वास करता है। उनका कथन था कि “संघ नहीं, समाज के कारण देश बड़ा हुआ, यही इतिहास में दर्ज होना चाहिए।”
समाज की शक्ति ही राष्ट्र की असली ताकत
भागवत ने कहा कि किसी भी राष्ट्र के भाग्य निर्माण में समाज की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। यदि समाज संगठित और चरित्रवान होगा तो राष्ट्र की सुरक्षा भी मजबूत होगी। उन्होंने उदाहरण देते हुए द्वितीय विश्व युद्ध के समय इंग्लैंड की स्थिति का उल्लेख किया और बताया कि जब युद्ध को लेकर दुविधा थी, तब नेतृत्व ने जनता की भावना को समझते हुए निर्णय लिया। इससे स्पष्ट होता है कि अंतिम शक्ति समाज के पास होती है।
उन्होंने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय वीरता और साहस की कमी नहीं थी, लेकिन संगठन की कमी के कारण वह प्रयास सफल नहीं हो सका। फिर भी स्वतंत्रता की ज्योति बुझी नहीं और आगे के आंदोलनों ने आजादी की राह प्रशस्त की।
स्वतंत्रता के बाद राजनीति में आई विकृति
मोहन भागवत ने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति तक सभी धाराएं एकजुट होकर संघर्ष कर रही थीं, लेकिन स्वतंत्रता के बाद राजनीति स्वार्थ की ओर मुड़ गई और अनेक राजनीतिक दल अस्तित्व में आए। उन्होंने कहा कि अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष केवल राजनीतिक नहीं था, बल्कि सामाजिक सुधार से भी जुड़ा था। जातिगत भेदभाव से ऊपर उठकर समाज को एकजुट करना आवश्यक था। आज भी विभिन्न राजनीतिक धाराओं के कारण विकृतियां उत्पन्न होती हैं।
डॉ. हेडगेवार की राष्ट्रभक्ति का उल्लेख
उन्होंने संघ के संस्थापक Keshav Baliram Hedgewar को जन्मजात राष्ट्रभक्त बताते हुए कहा कि उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय और निर्भीक भूमिका निभाई। वंदेमातरम् जैसे आंदोलनों में भाग लिया और जेल भी गए, लेकिन मातृभूमि के प्रति उनका समर्पण अटूट रहा। भागवत ने कहा कि आज संघ व्यक्ति निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुटा है।
विविधता में एकता: भारत की पहचान
अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि भारत भाषा, पंथ, परंपरा और देवी-देवताओं की विविधता वाला देश है, लेकिन इन सबको जोड़ने वाला एक सूत्र भी है, जिसे मजबूत बनाए रखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि भारत का स्वभाव विविधता में एकता का है। हमारे ऋषियों और पूर्वजों ने विश्व कल्याण की भावना से राष्ट्र की आधारशिला रखी। उन्होंने यह भी कहा कि हिंदू शब्द इस देश की पहचान है और इसमें मानवता तथा विश्व कल्याण का भाव समाहित है।
पूर्व सैनिकों से सेवा कार्यों में जुड़ने का आह्वान
भागवत ने पूर्व सैनिकों से आग्रह किया कि वे संघ के शिविरों और कार्यक्रमों में आकर स्वयंसेवकों के कार्य को देखें और अपनी रुचि के अनुसार सेवा गतिविधियों से जुड़ें। उन्होंने बताया कि देशभर में एक लाख तीस हजार से अधिक सेवा प्रकल्प संचालित हो रहे हैं, जिनमें शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक उत्थान से जुड़े अनेक कार्य शामिल हैं। इन प्रकल्पों में पूर्व सैनिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
सम्मान और कार्यक्रम का समापन
कार्यक्रम की शुरुआत भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पित कर और वंदे मातरम् के गायन से हुई। इस अवसर पर जनरल गुलाब सिंह रावत, कर्नल कोठियाल और कर्नल मयंक चौबे ने मोहन भागवत का शाल और पारंपरिक टोपी से स्वागत किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रीय गान के साथ हुआ।
इस संवाद के माध्यम से संघ ने स्पष्ट किया कि उसका मूल लक्ष्य समाज को संगठित कर राष्ट्र को सशक्त बनाना है, न कि प्रत्यक्ष राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेना।
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