आय के स्रोतों पर उठे सवालों के बीच संघ का स्पष्टीकरण, बयान को प्रियांग खरगे की टिप्पणी से जोड़ा जा रहा
बेंगलुरु, 16 फरवरी (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने एक बार फिर दोहराया है कि संगठन का संचालन स्वयंसेवकों द्वारा स्वेच्छा से अर्पित की जाने वाली गुरूदक्षिणा से होता है और इसे दान के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। संघ की ओर से कहा गया है कि यह स्वयंसेवकों की भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। हाल के दिनों में आय के स्रोतों को लेकर उठे सवालों के बीच यह वक्तव्य चर्चा का केंद्र बन गया है।
वायरल वीडियो के बाद तेज हुई चर्चा
संघ के अधिकृत पत्रकार समूहों और समविचारी संगठनों के विभिन्न संवाद मंचों पर एक वीडियो तेजी से प्रसारित हो रहा है। इसमें संघ प्रमुख मोहन भागवत शताब्दी वर्ष के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए संगठन की कार्यप्रणाली और आर्थिक व्यवस्था पर प्रकाश डालते दिखाई दे रहे हैं। अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि स्वयंसेवकों द्वारा दी जाने वाली गुरूदक्षिणा दान नहीं, बल्कि उनकी भक्ति है। यह परंपरा संघ के प्रारंभ से चली आ रही है और इसी आधार पर संगठन अपने नियमित कार्य संचालित करता है।
प्रियांग खरगे के बयान से जोड़ा जा रहा संदर्भ
वीडियो के सामने आने के बाद इसे कर्नाटक सरकार में मंत्री प्रियांग खरगे द्वारा दिए गए बयान के संदर्भ में देखा जा रहा है। हाल ही में गांधी मैदान में आयोजित एक समारोह में खरगे ने संघ की आय को लेकर सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि संघ सार्वजनिक रूप से चंदा लेने से इनकार करता है, लेकिन इतने बड़े नेटवर्क वाले संगठन के संचालन के लिए धन कहां से आता है। उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि संघ को विदेशों से आर्थिक सहयोग मिल रहा है, जिनमें अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देश शामिल हैं।
संघ का पक्ष: गुरूदक्षिणा से चलता है काम
संघ की ओर से लंबे समय से यह कहा जाता रहा है कि वह किसी भी दल विशेष का समर्थन करने वाला राजनीतिक संगठन नहीं है, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में संलग्न संस्था है। संगठन का कहना है कि वर्ष में एक बार स्वयंसेवक स्वेच्छा से गुरूदक्षिणा अर्पित करते हैं और उसी से शाखाओं, प्रशिक्षण कार्यक्रमों, सेवा कार्यों और अन्य गतिविधियों का संचालन होता है। विशेष आयोजनों या अभियानों के समय भी स्वयंसेवक और समाज के लोग सहयोग देते हैं, जिसका पूरा लेखा-जोखा रखा जाता है।
पारदर्शिता पर जोर
संघ से जुड़े पदाधिकारियों का दावा है कि समाज में स्वयंसेवकों की विश्वसनीयता ही उनकी सबसे बड़ी पूंजी है। सहयोग के रूप में प्राप्त हर राशि को निर्धारित उद्देश्यों पर ही खर्च किया जाता है। संगठन के अनुसार पारदर्शिता उसकी कार्यसंस्कृति का मूल तत्व है, इसलिए बार-बार लगाए जाने वाले आरोपों पर वह सार्वजनिक विवाद में पड़ने के बजाय अपने काम पर ध्यान देना उचित समझता है।
संघ प्रमुख का स्पष्ट संदेश
इसी पृष्ठभूमि में संघ प्रमुख का वक्तव्य महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उन्होंने अपने संबोधन में यह रेखांकित किया कि गुरूदक्षिणा स्वैच्छिक होती है, किसी पर कोई दबाव नहीं रहता। स्वयंसेवक इसे श्रद्धा से देते हैं और संगठन उसे समाजहित के कार्यों में लगाता है। उनके अनुसार संघ का पूरा ढांचा सेवा, अनुशासन और समर्पण की भावना पर टिका है।
राजनीतिक हलकों में इस मुद्दे को लेकर बयानबाजी तेज है। एक ओर विपक्षी नेता आय के स्रोतों पर सवाल उठा रहे हैं, वहीं संघ अपने पुराने रुख को दोहराते हुए इसे स्वयंसेवकों की आस्था से जुड़ा विषय बता रहा है। आने वाले दिनों में इस बयान पर और प्रतिक्रियाएं सामने आ सकती हैं, लेकिन फिलहाल संघ ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उसकी आर्थिक व्यवस्था का आधार गुरूदक्षिणा ही है और इसे दान कहना उचित नहीं है।
✨ स्वदेश ज्योति के द्वारा | और भी दिलचस्प खबरें आपके लिए… सिर्फ़ स्वदेश ज्योति पर!
फिल्म निर्माता रोहित शेट्टी के घर फायरिंग: लॉरेंस गिरोह से जुड़े चार आरोपित झज्जर से गिरफ्तार
सबरीमाला में महिलाओं के साथ भेदभाव मामले में 9 जजों की पीठ गठित, 7 अप्रैल से होगी सुनवाई
अब भारत परदेस में भी आतंकियों पर सीधे प्रहार को तैयार -आलोक मेहता
/swadeshjyoti/media/agency_attachments/2025/11/09/2025-11-09t071157234z-logo-640-swadesh-jyoti-1-2025-11-09-12-41-56.png)
/swadeshjyoti/media/agency_attachments/2025/11/09/2025-11-09t071151025z-logo-640-swadesh-jyoti-1-2025-11-09-12-41-50.png)
/swadeshjyoti/media/media_files/2025/11/29/mohan-bhagwat-2025-11-29-20-23-00.jpeg)