श्रीहरिकोटा से प्रक्षेपित इसरो का 64वां पीएसएलवी मिशन अंतिम चरण में भटका, वैज्ञानिकों ने शुरू की गहन तकनीकी जांच

श्रीहरिकोटा। भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए रविवार का दिन निराशा लेकर आया, जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन का पीएसएलवी-सी62/ईओएस-एन1 मिशन तकनीकी खामी के कारण अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका। इस मिशन के तहत रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन द्वारा विकसित अत्यंत संवेदनशील और सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हाइपरस्पेक्ट्रल निगरानी उपग्रह ‘अन्वेषा’ को अंतरिक्ष में स्थापित किया जाना था, लेकिन प्रक्षेपण के दौरान रॉकेट के तीसरे चरण में आई गड़बड़ी के चलते उपग्रह को उसकी निर्धारित कक्षा में नहीं पहुंचाया जा सका।

इसरो की ओर से दी गई आधिकारिक जानकारी के अनुसार, पीएसएलवी रॉकेट की उड़ान प्रारंभिक चरणों में पूरी तरह सामान्य रही। पहले और दूसरे चरण ने अपेक्षित प्रदर्शन किया और मिशन कंट्रोल से जुड़े सभी मानक सही दिशा में आगे बढ़ते दिखाई दिए। हालांकि, जैसे ही रॉकेट तीसरे चरण यानी पीएस3 के अंतिम हिस्से में पहुंचा, उसी समय रॉकेट के पथ में असामान्य विचलन देखा गया। इस विचलन के कारण पेलोड को निर्धारित कक्षा में इंजेक्ट नहीं किया जा सका और अंततः मिशन को विफल घोषित करना पड़ा।

यह मिशन आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से सुबह 10 बजकर 18 मिनट पर प्रक्षेपित किया गया था। पीएसएलवी-सी62 इसरो का 64वां पीएसएलवी मिशन था, जिसे ईओएस-एन1 नाम दिया गया था। इस उड़ान के माध्यम से कुल 16 उपग्रहों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना थी, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण और रणनीतिक पेलोड ‘अन्वेषा’ था। मिशन की असफलता के साथ ही न केवल इसरो बल्कि रक्षा प्रतिष्ठान के लिए भी यह एक बड़ा झटका माना जा रहा है।

‘अन्वेषा’ उपग्रह को भारत की निगरानी और सुरक्षा क्षमताओं में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा था। इसरो के वैज्ञानिकों के अनुसार यह एक अत्याधुनिक हाइपरस्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट है, जो सामान्य उपग्रहों की तुलना में कहीं अधिक सूक्ष्म और विस्तृत जानकारी एकत्र करने में सक्षम है। यह उपग्रह जंगलों की घनी परतों के भीतर छिपी गतिविधियों से लेकर युद्ध क्षेत्र में छिपी बेहद छोटी वस्तुओं तक की पहचान कर सकता था। इसके माध्यम से पर्यावरण निगरानी, प्राकृतिक संसाधनों का मानचित्रण, आपदा प्रबंधन और सामरिक निगरानी जैसे क्षेत्रों में भारत को बड़ी तकनीकी बढ़त मिलने की उम्मीद थी।

मिशन की असफलता के बाद इसरो ने स्पष्ट किया है कि यह किसी एक प्रणाली की साधारण त्रुटि नहीं है, बल्कि तीसरे चरण के अंतिम क्षणों में उत्पन्न हुई तकनीकी समस्या की गहराई से जांच की जा रही है। इसरो के वरिष्ठ वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की एक विशेष टीम बनाई गई है, जो उड़ान डेटा, टेलीमेट्री और अन्य तकनीकी मानकों का विश्लेषण कर रही है। उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि खामी के वास्तविक कारणों की पहचान हो सके और भविष्य के मिशनों में इस तरह की त्रुटियों की पुनरावृत्ति न हो।

गौरतलब है कि पीएसएलवी को इसरो का सबसे भरोसेमंद प्रक्षेपण यान माना जाता रहा है। पिछले कई वर्षों में इस रॉकेट ने देश और विदेश के सैकड़ों उपग्रहों को सफलतापूर्वक कक्षा में स्थापित किया है। ऐसे में पीएसएलवी मिशन की विफलता को असामान्य माना जा रहा है, लेकिन इसरो के वैज्ञानिकों का कहना है कि अंतरिक्ष अभियानों में जोखिम हमेशा बना रहता है और असफलताओं से ही आगे की सफलताओं का मार्ग प्रशस्त होता है।

यह मिशन वर्ष 2026 में इसरो का पहला प्रक्षेपण भी था, जिससे इसे लेकर अपेक्षाएं और अधिक थीं। साथ ही यह न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड न्यू स्पेस इंडिया लिमिटेड का नौवां वाणिज्यिक मिशन था। एनएसआईएल के माध्यम से इसरो अंतरराष्ट्रीय और घरेलू स्तर पर वाणिज्यिक प्रक्षेपण सेवाएं प्रदान करता है। ऐसे में इस मिशन की विफलता का प्रभाव वाणिज्यिक विश्वसनीयता के दृष्टिकोण से भी आंका जा रहा है, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इसरो का समग्र ट्रैक रिकॉर्ड इतना मजबूत है कि एक असफलता से उसकी साख पर दीर्घकालिक असर नहीं पड़ेगा।

रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार ‘अन्वेषा’ जैसे उपग्रह की असफलता से भारत की सामरिक निगरानी योजनाओं को अस्थायी झटका जरूर लगा है, लेकिन यह स्थायी बाधा नहीं है। इसरो और डीआरडीओ के पास तकनीकी क्षमता और अनुभव है कि वे जल्द ही इस मिशन को दोबारा अंजाम दे सकें। वैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि उपग्रह और उसके सिस्टम से जुड़ा अधिकांश डेटा सुरक्षित है, जिससे भविष्य में मिशन को पुनः लॉन्च करने में समय और संसाधनों की बचत हो सकेगी।

इसरो ने अपने बयान में कहा है कि वह पारदर्शिता के साथ इस पूरे घटनाक्रम का विश्लेषण करेगा और जैसे ही जांच पूरी होगी, उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएंगे। अंतरिक्ष एजेंसी ने यह भी दोहराया कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम दीर्घकालिक दृष्टि से लगातार आगे बढ़ रहा है और इस तरह की चुनौतियां वैज्ञानिकों के आत्मविश्वास को कमजोर नहीं करतीं, बल्कि उन्हें और अधिक सशक्त बनाती हैं।

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