पंचांग के अनुसार प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि होने से 2 मार्च को होगा होलिका दहन

इस वर्ष होलिका दहन की तिथि को लेकर श्रद्धालुओं में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। इसका कारण पंचांग गणना और चंद्र ग्रहण की स्थिति को माना जा रहा है। फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च की शाम 5:55 बजे से आरंभ होकर 3 मार्च की शाम 5:07 बजे तक रहेगी। शास्त्रीय नियमों के अनुसार होलिका दहन तभी किया जाता है जब प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि विद्यमान हो। इस आधार पर इस वर्ष होलिका दहन 2 मार्च को किया जाएगा।

होलिका दहन को बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए अग्नि ने उन्हें सुरक्षित रखा और अत्याचारी होलिका दहन हो गई। तभी से यह पर्व आस्था, विश्वास और धर्म की विजय के रूप में मनाया जाता है।

प्रदोष काल का महत्व

धर्मग्रंथों में प्रदोष काल को अत्यंत शुभ माना गया है। यह सूर्यास्त के बाद का वह समय होता है जब वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा का संचार माना जाता है। होलिका दहन इसी काल में करने से परिवार में सुख, समृद्धि और शांति का वास होता है। इसलिए पंचांग में प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि का होना आवश्यक माना गया है।

होलिका दहन की विधि

होलिका दहन के दिन प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। शाम के समय शुभ मुहूर्त में होलिका के स्थान पर जाकर पूजा करें। लकड़ियों और उपलों से सजाई गई होलिका के पास जल, रोली, अक्षत, गुड़, हल्दी और नारियल अर्पित करें। इसके बाद कच्चा सूत होलिका के चारों ओर सात बार लपेटते हुए परिक्रमा करें। परिवार के सभी सदस्य अग्नि प्रज्वलित होने के बाद उसकी परिक्रमा कर मंगलकामना करें।

होलिका दहन पर विशेष उपाय

होलिका दहन के समय किए गए कुछ उपाय अत्यंत फलदायी माने जाते हैं। यदि परिवार में आर्थिक समस्या चल रही हो तो होलिका में साबुत धनिया और काले तिल अर्पित करें। इससे धन संबंधी बाधाएं दूर होने की मान्यता है।

यदि घर में नकारात्मकता या कलह का वातावरण हो तो होलिका की अग्नि में लौंग और इलायची अर्पित कर परिवार की शांति के लिए प्रार्थना करें। मान्यता है कि इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

रोग बाधा से मुक्ति के लिए सरसों के कुछ दाने और कपूर अग्नि में समर्पित करें। इसके बाद अग्नि की राख को अगले दिन तिलक के रूप में लगाने से रक्षा कवच की प्राप्ति होती है।

कर्ज से परेशान लोग होलिका दहन के समय पांच गोमती चक्र अग्नि में अर्पित करें और ईश्वर से मुक्ति की प्रार्थना करें। यह उपाय आर्थिक स्थिरता के लिए लाभकारी माना गया है।

सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व

होलिका दहन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। लोग एकत्र होकर बुराइयों को त्यागने और नए उत्साह के साथ जीवन की शुरुआत का संकल्प लेते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि सत्य और भक्ति की शक्ति सबसे बड़ी होती है।

होलिका की अग्नि में पुरानी नकारात्मक आदतों और दुर्भावनाओं को त्यागने का भाव रखा जाता है। अगले दिन रंगोत्सव के साथ जीवन में आनंद और उल्लास का संदेश फैलाया जाता है।

इस प्रकार 2 मार्च को प्रदोष काल में पूर्णिमा तिथि होने के कारण होलिका दहन किया जाएगा। श्रद्धालुओं को शुभ मुहूर्त में विधि-विधान से पूजा कर अपने जीवन में सुख-समृद्धि और शांति की कामना करनी चाहिए।

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