ऊंचे पहाड़ी इलाकों और प्राकृतिक गुफाओं में छिपे आतंकियों के खिलाफ मोर्टार कार्रवाई की तैयारी, सुरक्षा बलों ने बदली युद्ध रणनीति

नई दिल्ली। जम्मू-कश्मीर में सक्रिय आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा बलों ने अब अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए निर्णायक और आक्रामक रुख अपनाने का फैसला किया है। नई रणनीति के तहत अब आतंकियों के बाहर निकलने का इंतजार नहीं किया जाएगा, बल्कि उन्हें उनके छिपे ठिकानों पर ही घेरकर समाप्त किया जाएगा। सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार जम्मू-कश्मीर के विभिन्न इलाकों में इस समय लगभग 85 पाकिस्तानी दहशतगर्द सक्रिय हैं, जो आधुनिक हथियारों और अत्यंत घातक गोलियों से लैस होकर पहाड़ी क्षेत्रों में छिपे हुए हैं।

सूत्रों के अनुसार आतंकियों द्वारा उपयोग किए जा रहे हथियारों और गोलियों ने सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बढ़ा दी थी। यही कारण है कि अब पारंपरिक मुठभेड़ रणनीति के स्थान पर ठिकानों को सीधे ध्वस्त करने की योजना तैयार की गई है, जिसमें मोर्टार जैसे भारी हथियारों का उपयोग किया जाएगा।

पहाड़ों और प्राकृतिक गुफाओं में छिपे आतंकी

सुरक्षा एजेंसियों की रिपोर्ट के अनुसार जम्मू क्षेत्र में लगभग 30 से 40 विदेशी आतंकी सक्रिय बताए जा रहे हैं, जबकि कश्मीर घाटी में इनकी संख्या 40 से 57 के बीच आंकी गई है। इसके अतिरिक्त छह स्थानीय आतंकी भी सक्रिय हैं। इनमें से दो आतंकी लतीफ और जाकिर जम्मू-कश्मीर के भीतर छिपे बताए जा रहे हैं, जबकि अन्य चार की लोकेशन सीमा पार होने की जानकारी मिली है।

ज्यादातर आतंकी ऊंचाई वाले दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में बनी प्राकृतिक गुफाओं और चट्टानी ठिकानों में छिपे हुए हैं। ऐसे स्थानों तक पहुंचना सुरक्षा बलों के लिए बेहद जोखिम भरा होता है, क्योंकि आतंकियों को ऊंचाई का सामरिक लाभ मिल जाता है।

अत्याधुनिक हथियारों से लैस दहशतगर्द

हाल के अभियानों में बरामद हथियारों से यह स्पष्ट हुआ है कि आतंकियों के पास अमेरिकी एम-4 राइफल और एके-47 जैसे आधुनिक हथियार मौजूद हैं। किश्तवाड़ में तीन दिन पहले हुई भीषण मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े तीन आतंकियों को मार गिराया था। मुठभेड़ स्थल से दो एके-47 राइफल, एक एम-4 राइफल और स्टील कोर गोलियां बरामद हुई थीं।

पिछले पांच से छह वर्षों के दौरान कई मुठभेड़ों में आतंकियों के पास एम-4 राइफल और विशेष स्टील की गोलियां मिलने की घटनाएं सामने आई हैं। सुरक्षा विशेषज्ञों के अनुसार ये गोलियां सामान्य बुलेटप्रूफ सुरक्षा उपकरणों को भी भेदने में सक्षम होती हैं।

स्टील कोर गोलियां बनी बड़ी चुनौती

स्टील कोर वाली गोलियां सुरक्षा बलों के लिए गंभीर खतरा मानी जा रही हैं। वर्ष 2017 में पुलवामा के लेथपोरा स्थित केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल शिविर पर हुए आतंकी हमले में पहली बार इस प्रकार की गोलियों का इस्तेमाल सामने आया था। इन गोलियों को रोकने की क्षमता केवल उच्च श्रेणी के सुरक्षा कवच में होती है।

जानकारी के अनुसार 7.62 मिलीमीटर स्टील कोर गोलियों की मारक क्षमता लगभग तीन सौ मीटर तक होती है। आतंकी इनका उपयोग घात लगाकर किए जाने वाले हमलों में करते हैं। कम दूरी से दागी गई ये गोलियां सामान्य स्तर के बुलेटप्रूफ वाहन, सुरक्षा मोर्चे, जैकेट और सिर सुरक्षा उपकरणों को भी भेद सकती हैं।

नई रणनीति: मोर्टार से ध्वस्त होंगे ठिकाने

लगातार बढ़ते खतरे और जवानों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा बलों ने अब नई कार्रवाई योजना तैयार की है। इसके तहत पहाड़ियों, गुफाओं या बंकरों में छिपे आतंकियों पर सीधे मोर्टार से हमला किया जाएगा, ताकि मुठभेड़ लंबी न खिंचे और सुरक्षा बलों को अनावश्यक जोखिम का सामना न करना पड़े।

पिछले तीन से चार वर्षों में आतंकवाद विरोधी अभियानों के दौरान कई जवानों को शहादत देनी पड़ी है, जिनमें अधिकांश मामलों में आतंकियों द्वारा स्टील कोर गोलियों का इस्तेमाल किया गया था। नई रणनीति का उद्देश्य जवानों की सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए आतंकियों की क्षमता को शुरुआती चरण में ही समाप्त करना है।

आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक चरण

सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ अभियान अब निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुका है। सीमा पार से घुसपैठ और आधुनिक हथियारों की आपूर्ति को देखते हुए सैन्य रणनीति में बदलाव आवश्यक हो गया था। मोर्टार आधारित कार्रवाई से दुर्गम इलाकों में छिपे आतंकियों को सुरक्षित ठिकाने मिलने की संभावना कम हो जाएगी।

विशेषज्ञों के अनुसार यह रणनीति न केवल आतंकियों के मनोबल को कमजोर करेगी बल्कि भविष्य में पहाड़ी क्षेत्रों को आतंकवाद के सुरक्षित अड्डों के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिशों पर भी रोक लगाएगी।

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