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सुदेश गौड़
वरिष्ठ पत्रकार
वैश्विक लोकतंत्र में होगी भारत की निर्णायक भूमिका
भारत ने पिछले 11 वर्षों में वैश्विक मंच पर अपनी भूमिका को केवल एक उभरती हुई आर्थिक शक्ति तक सीमित नहीं रखा, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के संवाहक और संरक्षक के रूप में भी अपनी पहचान मजबूत की है। इसी दिशा में लोकसभा के अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा 60 से अधिक देशों के साथ संसदीय सहयोग को मजबूत करने के उद्देश्य से सर्वदलीय संसदीय मैत्री समूहों का गठन एक महत्वपूर्ण और दूरदर्शी कदम है। यह पहल न केवल भारत की कूटनीतिक सक्रियता को दर्शाती है, बल्कि वैश्विक लोकतंत्र को सशक्त बनाने की दिशा में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को भी स्थापित करती है।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत सरकार ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना पक्ष स्पष्ट करने और आतंकवाद के खिलाफ समर्थन जुटाने के लिए व्यापक कूटनीतिक पहल शुरू की थी जो पूरे विश्व में चर्चा का विषय रहा था। उसी श्रृंखला की अगली कड़ी है यह पहल। ऑपरेशन सिंदूर के बाद विदेश मंत्रालय के समन्वय से विभिन्न राजनीतिक दलों के सांसदों और पूर्व राजनयिकों को शामिल करते हुए भारत सरकार ने तब कुल सात अलग-अलग सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल भेजे थे, जिन्होंने 33 देशों की यात्रा की। इन प्रतिनिधि मंडलों में सभी दलों के प्रमुख नेता शामिल थे जैसे शशि थरूर, असदुद्दीन ओवैसी, रवि शंकर प्रसाद,संजय झा, बैजयंत पांडा, सुप्रिया सुले, श्रीकांत शिंदे और कनिमोझी।
संसदीय कूटनीति: नई वैश्विक रणनीति का आधार
पारंपरिक कूटनीति जहां सरकारों के बीच संबंधों पर केंद्रित होती है, वहीं संसदीय कूटनीति लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा देती है। संसदीय मैत्री समूहों का गठन इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है क्योंकि यह विभिन्न देशों के सांसदों के बीच संवाद, अनुभवों के आदान-प्रदान और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के सुदृढ़ीकरण का मंच प्रदान करेगा। भारत, जो विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, उसके पास विविधता, चुनाव प्रबंधन, संसदीय प्रक्रियाओं और लोकतांत्रिक स्थिरता का विशाल अनुभव है। इस अनुभव को वैश्विक स्तर पर साझा करना भारत की सॉफ्ट पावर को और मजबूत करेगा।
वैश्विक लोकतंत्र पर प्रभाव: भारत एक मार्गदर्शक के रूप में
आज विश्व में लोकतंत्र कई प्रकार की चुनौतियों का सामना कर रहा है जैसे राजनीतिक ध्रुवीकरण, संस्थागत अविश्वास, तानाशाही प्रवृत्तियों का उभार और सूचना युद्ध जैसी समस्याएं लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को कमजोर कर रही हैं। ऐसे समय में भारत द्वारा संसदीय सहयोग को बढ़ावा देना वैश्विक लोकतंत्र के लिए एक सकारात्मक संकेत है। इस पहल से लोकतांत्रिक संस्थाओं के बीच विश्वास और सहयोग बढ़ेगा, विकासशील देशों को भारत के लोकतांत्रिक मॉडल से सीखने का अवसर मिलेगा, लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए वैश्विक स्तर पर एक वैकल्पिक और संतुलित दृष्टिकोण विकसित होगा, साथ ही भारत का लोकतांत्रिक मॉडल, जिसमें विविधता के बावजूद स्थिरता बनी रही है, अन्य देशों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकता है।
भारत की वैश्विक छवि पर सकारात्मक प्रभाव:
यह पहल भारत की छवि को केवल एक क्षेत्रीय शक्ति से आगे बढ़ाकर एक वैश्विक लोकतांत्रिक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करेगी। भारत पहले ही जी-20 की अध्यक्षता के दौरान “वसुधैव कुटुम्बकम” के सिद्धांत को वैश्विक मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत कर चुका है। संसदीय पैनल का गठन इसी व्यापक दृष्टि का विस्तार है। इससे भारत की छवि पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ेंगे जैसे भारत लोकतांत्रिक मूल्यों के संरक्षक के रूप में स्थापित होगा, विकासशील देशों के लिए भारत एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में उभरेगा, पश्चिमी लोकतंत्रों और ग्लोबल साउथ के बीच भारत एक सेतु की भूमिका निभा सकेगा। यह पहल भारत की सॉफ्ट पावर, नैतिक प्रभाव और वैश्विक विश्वसनीयता को बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
रणनीतिक और कूटनीतिक लाभ: दीर्घकालिक प्रभाव
संसदीय मैत्री समूहों का गठन केवल लोकतांत्रिक सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके व्यापक रणनीतिक और भू-राजनीतिक प्रभाव भी होंगे।
1. वैश्विक प्रभाव क्षेत्र का विस्तार- संसदीय स्तर पर सहयोग से भारत विभिन्न देशों के नीति-निर्माताओं के साथ प्रत्यक्ष संबंध स्थापित कर सकेगा, जिससे भविष्य में रणनीतिक साझेदारी मजबूत होगी।
2. ग्लोबल साउथ में नेतृत्व की मजबूती- भारत पहले से ही ग्लोबल साउथ की आवाज के रूप में उभर रहा है। यह पहल भारत की इस भूमिका को संस्थागत रूप देगी और विकासशील देशों के बीच भारत का प्रभाव बढ़ेगा।
3. चीन के प्रभाव का संतुलन- वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में चीन आर्थिक और रणनीतिक माध्यमों से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। भारत की संसदीय कूटनीति लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर एक वैकल्पिक और विश्वसनीय मॉडल प्रस्तुत कर सकती है।
4. बहुपक्षीय मंचों पर स्थिति मजबूत होगी- संयुक्त राष्ट्र और अन्य वैश्विक संस्थाओं में भारत की भूमिका और प्रभाव बढ़ाने में यह पहल सहायक हो सकती है।
लोकतांत्रिक विरासत का वैश्विक विस्तार
भारत की लोकतांत्रिक परंपरा केवल संवैधानिक व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों में भी गहराई से निहित है। नियमित चुनाव, शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन और संस्थागत स्थिरता भारत की लोकतांत्रिक मजबूती का प्रमाण हैं।
संसदीय मैत्री समूहों के माध्यम से भारत अपने इस अनुभव को वैश्विक स्तर पर साझा कर सकेगा, जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने में मदद मिलेगी।
भारत का उभरता लोकतांत्रिक नेतृत्व लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला द्वारा 60 से अधिक देशों के संसदीय मैत्री समूहों का गठन भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और वैश्विक दृष्टि का प्रतीक है। यह पहल भारत को केवल एक आर्थिक या सामरिक शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के वैश्विक संरक्षक और मार्गदर्शक के रूप में स्थापित करती है।
दीर्घकालिक दृष्टि से यह कदम भारत के लिए कूटनीतिक, राजनीतिक और रणनीतिक रूप से अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा। यह न केवल वैश्विक लोकतंत्र को मजबूत करेगा, बल्कि भारत को 21वीं सदी में एक निर्णायक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।
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