वैश्विक दक्षिण के लिए बड़ा अवसर, लेकिन सुरक्षा मानकों के साथ आगे बढ़ने की जरूरत

भारत की मेजबानी में महत्वपूर्ण सम्मेलन

नई दिल्ली, 14 फ़रवरी (हि.स.)। भारत की मेजबानी में 16 से 20 फरवरी तक होने जा रहा इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट वैश्विक स्तर पर जलवायु और नई तकनीकों के मेल को लेकर एक अहम पड़ाव माना जा रहा है। भारत मंडपम में आयोजित इस सम्मेलन में दुनिया भर से प्रौद्योगिकी क्षेत्र के प्रतिनिधि, नीति विशेषज्ञ और शोधकर्ता जुटेंगे। इस आयोजन को ऐसे समय में देखा जा रहा है जब जलवायु जोखिम तेजी से बढ़ रहे हैं और देशों को समाधान के नए रास्तों की आवश्यकता है।

नियम तय करने की दिशा में पहल

जलवायु और कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर विशेषज्ञ समूह का नेतृत्व कर रहे अरुणाभा घोष ने कहा कि यह आयोजन वैश्विक दक्षिण के लिए अपनी तरह की पहली बड़ी पहल है। उनके अनुसार वे देश, जो जलवायु संकट का सबसे अधिक सामना कर रहे हैं, अब केवल प्रभाव झेलने तक सीमित नहीं रहना चाहते बल्कि आने वाले तकनीकी बदलावों के नियम तय करने में भी भूमिका निभाना चाहते हैं। यह बदलाव वैश्विक शक्ति संतुलन में एक नए चरण का संकेत देता है।

जटिल समस्या का जटिल समाधान

घोष ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता की वास्तविक ताकत कठिन और उलझी हुई समस्याओं को समझने और सुलझाने में है। जलवायु परिवर्तन ऐसी ही चुनौती है, जो मौसम, अर्थव्यवस्था, कृषि, ऊर्जा और मानव जीवन के अनेक पहलुओं को एक साथ प्रभावित करती है। पारंपरिक तरीकों से इन जटिलताओं को संभालना कठिन होता जा रहा है, इसलिए नई तकनीकी क्षमता की जरूरत महसूस की जा रही है।

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अक्षय ऊर्जा और आपदा प्रबंधन में भूमिका

उन्होंने बताया कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग अक्षय ऊर्जा प्रणालियों को संतुलित करने में किया जा सकता है, ताकि बिजली उत्पादन और मांग के बीच तालमेल बेहतर हो सके। बाढ़ जैसी आपदाओं के पूर्वानुमान को अधिक सटीक बनाया जा सकता है, जिससे समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके। खेती के क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर लचीलापन विकसित करने में यह तकनीक मददगार बन सकती है।

विकास निर्णयों में जलवायु समझ

घोष ने कहा कि भारत के पास व्यापक डिजिटल सार्वजनिक ढांचा मौजूद है। यह स्थिति देश को एक अनोखा अवसर देती है कि विकास से जुड़े हर बड़े निर्णय में जलवायु समझ को सीधे जोड़ा जाए। यानी सड़क, शहर, उद्योग या कृषि की योजना बनाते समय यह आकलन किया जा सके कि उसका पर्यावरण पर क्या प्रभाव पड़ेगा और जोखिमों को कैसे कम किया जा सकता है।

जिम्मेदार उपयोग की अनिवार्यता

हालांकि उन्होंने सावधान भी किया कि यह प्रगति सुरक्षा मानकों के साथ आनी चाहिए। बड़े डाटा केंद्र ऊर्जा और पानी की भारी खपत करते हैं, जबकि इनके संचालन को लेकर स्पष्ट और सख्त ढांचा अभी विकसित नहीं हो पाया है। यदि सावधानी नहीं बरती गई, तो समाधान की जगह नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

उन्होंने कहा कि जलवायु के लिए जिम्मेदार कृत्रिम बुद्धिमत्ता का अर्थ है पारदर्शी पर्यावरणीय रिपोर्टिंग, जरूरत के अनुसार उपयुक्त आकार के मॉडल चुनना, बुनियादी ढांचे का सोच-समझकर निर्माण और अंतिम नियंत्रण इंसानों के हाथ में रखना। तकनीक का उद्देश्य मानवीय निर्णयों को मजबूत करना होना चाहिए, न कि उन्हें पूरी तरह बदल देना।

मानवीय क्षमता में निवेश जरूरी

घोष ने यह भी कहा कि केवल बुद्धिमान प्रणालियां बना लेना पर्याप्त नहीं है। उन्हें सही ढंग से संचालित करने और उनके परिणामों को समझने के लिए प्रशिक्षित मानव संसाधन भी चाहिए। इसलिए शिक्षा, अनुसंधान और कौशल विकास में निवेश उतना ही महत्वपूर्ण है जितना तकनीकी विकास में।

भविष्य की दिशा तय करने का समय

यह सम्मेलन इस बात का संकेत है कि जलवायु संकट से जूझती दुनिया अब नई सोच अपनाने को तैयार है। भारत की भूमिका यहां इसलिए भी अहम है क्योंकि वह विकास की आकांक्षाओं और पर्यावरणीय जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है। आने वाले दिनों में इस मंच से निकले विचार नीति निर्माण और वैश्विक सहयोग की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

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