गर्म होती दुनिया में सुरक्षा, जवाबदेही और साझी भागीदारी का संदेश
पैनल चर्चा में भारत की बढ़ती प्रतिबद्धता का उल्लेख
म्यूनिख, 14 फरवरी (हि.स.)। केंद्रीय वित्त एवं कॉरपोरेट कार्य मंत्री निर्मला सीतारमण ने जर्मनी के म्यूनिख में आयोजित Munich Security Conference के दौरान जलवायु कार्रवाई के प्रति भारत की मजबूत प्रतिबद्धता को सामने रखा। “अस्थिरता की डिग्री: गर्म होती दुनिया में जलवायु सुरक्षा” विषय पर आयोजित पैनल चर्चा में उन्होंने कहा कि भारत ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए अपने दायित्वों को लगातार आगे बढ़ाया है।
उन्होंने यह स्पष्ट किया कि जलवायु परिवर्तन अब केवल प्रकृति का प्रश्न नहीं रह गया है, बल्कि यह आर्थिक ढांचे, सामाजिक स्थिरता और वैश्विक सुरक्षा से गहराई से जुड़ा विषय बन चुका है। इसलिए इस पर निर्णय लेते समय सभी देशों को वास्तविकताओं को ध्यान में रखना होगा।
As much attention as we give to emission control, we need to look at resilience and adaptation. Otherwise, you’re going to sacrifice a lot.
— Nirmala Sitharaman Office (@nsitharamanoffc) February 14, 2026
Technologies will have to talk to each other. No one can say they’ve created a perfect system to counter climate concerns.
And it can’t be… pic.twitter.com/3lyrTW9Dzj
‘प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करेगा’ सिद्धांत पर जोर
सीतारमण ने चर्चा के दौरान कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए देशों के बीच जिम्मेदारियां तय करते समय ‘प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करेगा’ का सिद्धांत अपनाना बेहद आवश्यक है। उनका कहना था कि जिन देशों का ऐतिहासिक उत्सर्जन अधिक रहा है, उन्हें अधिक जिम्मेदारी उठानी चाहिए। विकासशील देशों पर समान बोझ डालना न्यायपूर्ण व्यवस्था नहीं हो सकती।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि अगर न्याय और समान अवसर की भावना के साथ कदम नहीं बढ़ाए गए, तो वैश्विक सहमति बनाना कठिन हो जाएगा। दुनिया को समाधान चाहिए और समाधान तभी निकलेगा जब भरोसे का वातावरण बनेगा।
जलवायु खर्च में उल्लेखनीय बढ़ोतरी
वित्त मंत्री ने बताया कि भारत ने अपने संसाधनों से जलवायु कार्रवाई पर निवेश बढ़ाया है। छह साल पहले जहां देश अपनी सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 3.7 प्रतिशत इस दिशा में खर्च कर रहा था, वहीं अब यह आंकड़ा करीब 5.6 प्रतिशत तक पहुंच गया है। यह बदलाव दर्शाता है कि भारत केवल वादों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीन पर ठोस प्रयास कर रहा है।
उन्होंने कहा कि नवीकरणीय ऊर्जा, हरित ढांचे और पर्यावरण अनुकूल नीतियों पर तेजी से काम हो रहा है। भारत यह दिखाना चाहता है कि विकास और जलवायु जिम्मेदारी साथ-साथ चल सकते हैं।
प्रौद्योगिकी साझा करने की अपील
सीतारमण ने सम्मेलन में मौजूद देशों से आग्रह किया कि वे अपनी उन्नत प्रौद्योगिकियां व्यावसायिक आधार पर उपलब्ध कराएं। उनका कहना था कि यदि स्वच्छ तकनीक सुलभ होगी तो विकासशील देश भी तेजी से बदलाव ला पाएंगे। केवल लक्ष्य तय कर देने से काम नहीं चलेगा, बल्कि साधन भी उपलब्ध कराने होंगे।
उन्होंने कहा कि भारत कहीं से वित्त या तकनीक आने का इंतजार नहीं कर रहा है, फिर भी वैश्विक सहयोग आवश्यक है। यह साझेदारी जितनी मजबूत होगी, परिणाम उतने ही बेहतर होंगे।
जलवायु संकट : सीमाओं से परे चुनौती
वित्त मंत्री ने कहा कि जलवायु परिवर्तन का असर किसी एक देश तक सीमित नहीं रहता। बाढ़, सूखा, गर्मी की लहरें और अन्य आपदाएं पूरी दुनिया को प्रभावित करती हैं। इसलिए प्रतिक्रिया भी सामूहिक होनी चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि विकासशील देशों को गरीबी उन्मूलन, ऊर्जा उपलब्धता और रोजगार जैसे मोर्चों पर भी समानांतर काम करना पड़ता है, ऐसे में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है।
वैश्विक मंच पर बढ़ती बहस
म्यूनिख में चल रहा यह सम्मेलन 13 से 15 फरवरी तक विभिन्न वैश्विक चुनौतियों पर मंथन का केंद्र बना हुआ है। बड़ी संख्या में देशों के प्रतिनिधि और नीति निर्धारक इसमें शामिल हो रहे हैं। इस बार जलवायु सुरक्षा प्रमुख विषयों में है, क्योंकि इसके प्रभाव अब हर क्षेत्र में दिखाई दे रहे हैं।
सीतारमण की ओर से उठाए गए मुद्दे यह संकेत देते हैं कि आने वाले समय में जलवायु न्याय, वित्तपोषण और तकनीकी सहयोग पर चर्चा और तेज हो सकती है। भारत का रुख स्पष्ट है कि वह अपनी भूमिका निभा रहा है, लेकिन वैश्विक स्तर पर संतुलित और न्यायपूर्ण भागीदारी भी उतनी ही जरूरी है।
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