पूर्व विश्व नंबर-1 और ओलिंपिक पदक विजेता साइना ने पॉडकास्ट में किया खुलासा, दो साल पहले ही खेल चुकी थीं आखिरी मुकाबला
नई दिल्ली। भारतीय बैडमिंटन को वैश्विक पहचान दिलाने वाली दिग्गज खिलाड़ी साइना नेहवाल ने प्रोफेशनल बैडमिंटन से संन्यास लेने की घोषणा कर दी है। 35 वर्षीय साइना ने यह खुलासा एक पॉडकास्ट के दौरान किया, जहां उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि घुटनों में लगातार बने रहने वाले दर्द और गंभीर चिकित्सकीय समस्याओं के कारण अब उनके लिए प्रतिस्पर्धात्मक बैडमिंटन खेलना संभव नहीं रह गया है। उन्होंने बताया कि वह जून 2023 में सिंगापुर ओपन के बाद से किसी भी अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में नहीं उतरीं और वास्तव में दो साल पहले ही खेल से दूरी बना चुकी थीं।
औपचारिक घोषणा न करने की वजह भी बताई
पॉडकास्ट में बातचीत के दौरान साइना ने कहा कि उन्होंने अपने करियर को अपनी शर्तों पर जिया और अपनी शर्तों पर ही खत्म किया। उनके शब्दों में, “मैंने दो साल पहले ही खेलना बंद कर दिया था। मैंने अपनी शर्तों पर खेलना शुरू किया और अपनी शर्तों पर ही छोड़ा। इसलिए मुझे कभी यह जरूरी नहीं लगा कि औपचारिक रूप से संन्यास की घोषणा की जाए।” साइना के इस बयान से साफ है कि उनके लिए यह फैसला अचानक नहीं, बल्कि लंबे समय से चल रहे शारीरिक संघर्षों के बाद लिया गया सोचा-समझा निर्णय था।
ओलिंपिक पदक जीतने वाली भारत की पहली बैडमिंटन खिलाड़ी
साइना नेहवाल भारतीय खेल इतिहास की उन चुनिंदा खिलाड़ियों में शामिल हैं, जिन्होंने देश को बैडमिंटन में नई पहचान दिलाई। उन्होंने लंदन ओलिंपिक 2012 में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा और ओलिंपिक में पदक जीतने वाली भारत की पहली महिला बैडमिंटन खिलाड़ी बनीं। यही नहीं, साइना ने तीन ओलिंपिक खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जो अपने आप में उनकी निरंतरता और फिटनेस का प्रमाण रहा।
विश्व नंबर-1 बनने तक का सफर
साइना का करियर सिर्फ ओलिंपिक पदक तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने विश्व बैडमिंटन में भारत का परचम लहराया और विश्व नंबर-1 रैंकिंग तक पहुंचने का गौरव भी हासिल किया। वर्ष 2008 में बैडमिंटन वर्ल्ड फेडरेशन की वर्ल्ड जूनियर चैंपियनशिप जीतकर उन्होंने पहली बार अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी। इसके बाद 2009 में बीडब्ल्यूएफ सुपर सीरीज खिताब जीतने वाली वह पहली भारतीय खिलाड़ी बनीं, जिसने भारतीय बैडमिंटन के लिए नए रास्ते खोल दिए।
कॉमनवेल्थ गेम्स में भी स्वर्णिम प्रदर्शन
साइना नेहवाल का दबदबा कॉमनवेल्थ गेम्स में भी साफ नजर आया। उन्होंने 2010 और 2018 के कॉमनवेल्थ खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर भारत के लिए बड़ी उपलब्धि हासिल की। इन जीतों ने न केवल उनके व्यक्तिगत करियर को ऊंचाइयों तक पहुंचाया, बल्कि भारत में महिला बैडमिंटन को भी नई प्रेरणा दी।
गठिया और घुटनों की समस्या ने तोड़ा सपना
संन्यास की सबसे बड़ी वजह साइना की शारीरिक स्थिति रही। उन्होंने बताया कि उनके घुटनों का कार्टिलेज पूरी तरह घिस चुका है और उन्हें गठिया की समस्या हो गई है। साइना के अनुसार, “जब आप खेल ही नहीं पा रहे, तो वहीं रुक जाना चाहिए। मैं पहले दिन में 8 से 9 घंटे तक ट्रेनिंग करती थी, लेकिन अब मेरे घुटने एक-दो घंटे में ही जवाब दे देते हैं। इसके बाद सूजन आ जाती है।” उन्होंने साफ कहा कि मौजूदा हालात में करियर को और आगे खींचना उनके लिए संभव नहीं था।
रियो ओलिंपिक 2016 की चोट से बदला करियर
साइना के करियर में सबसे बड़ा मोड़ रियो ओलिंपिक 2016 के दौरान लगी घुटने की चोट को माना जाता है। इस चोट के बाद उनका करियर बुरी तरह प्रभावित हुआ। हालांकि, तमाम मुश्किलों के बावजूद साइना ने हार नहीं मानी और 2017 की वर्ल्ड चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीतकर जोरदार वापसी की। इसके बाद 2018 के कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीतकर उन्होंने साबित किया कि वह मानसिक रूप से कितनी मजबूत खिलाड़ी हैं।
भारतीय बैडमिंटन पर अमिट छाप
साइना नेहवाल का योगदान सिर्फ पदकों तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने भारतीय बैडमिंटन को नई पीढ़ी के लिए एक मजबूत आधार दिया। उनकी सफलता ने पी.वी. सिंधु समेत कई युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया और देश में महिला बैडमिंटन को लोकप्रिय बनाया। साइना का संघर्ष, अनुशासन और जज्बा हमेशा भारतीय खेल इतिहास का अहम हिस्सा रहेगा।
एक युग का अंत, प्रेरणा हमेशा जिंदा
साइना नेहवाल का संन्यास भारतीय खेल जगत के लिए एक युग के अंत जैसा है। हालांकि, वह अब कोर्ट पर नजर नहीं आएंगी, लेकिन उनकी उपलब्धियां, संघर्ष और प्रेरणादायक सफर आने वाली पीढ़ियों को हमेशा मार्गदर्शन देता रहेगा। साइना ने यह साबित किया कि सीमित संसाधनों के बावजूद भी विश्व स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है, बस जरूरत होती है जुनून और दृढ़ संकल्प की।
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