यूट्यूब पर आया AI कंटेंट भले ही बच्चों को आसानी से समझ आ जाए और उसमें उन्हें रुचि आए, पर सच्चाई यही है कि यह बच्चों के दिमाग पर गहरा असर भी डाल रहा है। यह बच्चों की सोचने और समझने की शक्ति को प्रभावित कर रहा है।

यू-ट्यूव शॉर्टस इंस्टाग्राम रील और AI से बने एनिमेटेड वीडियो बच्चों को आकर्षित कर रहे हैं। रंग-बिरंगे, तेज आवाज वाले और तेज़ी से बदलते दृश्य बच्चों का ध्यान तुरंत खींच लेते हैं।

लेकिन विशेषज्ञों की चेतावनी है — यह आकर्षण धीरे-धीरे उनके दिमाग की संरचना और सोचने की क्षमता को प्रभावित कर रहा है।

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कुछ वीडियो ऐसे होते हैं जिनमें जानकारी गलत होती है। कई वीडियों में लोग और जानवरों के चेहरे भी विकृत होते हैं। इससे बच्चों की मानसिक स्थिति पर गहरा असर पड़ता है, जो कि वास्तविकता से बिलकुल अलग है।

नकली को ही असली समझ रहें है बच्चे

मिशिगन यूनिवर्सिटी की बाल विशेषज्ञ के अनुसार, ऐसे 30 या 60 सेकंड के वीडियो केवल बच्चों का ध्यान आकर्षित करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे वीडियो से बच्चे हकीकत और कल्पनिकता के बीच फर्क नहीं कर पाते, जिससे उनकी मानसिक स्वास्थ्य पर भारी असर पड़ता है। कुछ अन्य शोध और डॉक्टरों की राय के अनुसार भविष्य में लोग नकली कंटेंट को ही असली मानने लगेंगे, क्योंकि उनका मानसिक ढांचा उसी की आदत डाल लेगा।

“फ्यूचर जेनरेशन डीपफेक को सच मानेगी?”

डिजिटल एथिक्स विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार AI और डीपफेक वीडियो देखने से भविष्य की पीढ़ी सत्य और असत्य के बीच फर्क करने में कमजोर हो सकती है।

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अगर बचपन से ही मस्तिष्क को काल्पनिक दृश्य और बनावटी घटनाएँ परोसी जाएँ, तो वास्तविकता की समझ धुंधली हो सकती है।

“हकीकत और कल्पना के बीच फर्क मिट रहा है”

University of Michigan की बाल विशेषज्ञों के अनुसार, 30 या 60 सेकंड के वीडियो बच्चों के मस्तिष्क को “इंस्टेंट ग्रैटिफिकेशन” का आदी बना देते हैं।

शोध बताते हैं कि 7–12 वर्ष के बच्चे डिजिटल कंटेंट में दिख रहे विजुअल्स को अक्सर वास्तविक मान लेते हैं, खासकर जब वह AI से तैयार किया गया हो और अत्यधिक यथार्थवादी दिखे।

2023 में डिजिटल मीडिया पर हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार:

  • 40% बच्चों ने AI से बनाए गए चेहरों को असली इंसान समझा।

  • 35% बच्चों ने काल्पनिक घटनाओं को वास्तविक घटना माना।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब बार-बार ऐसा कंटेंट देखा जाता है, तो दिमाग “नकली” को भी “सामान्य” मानने लगता है।

अमेरिका में माता-पिता के लिए गाइडलाइन जारी

अमेरिकन पीडियाट्रिक्स एकेडमी ने माता-पिता के लिए गाइडलाइन्स भी जारी कर दी हैं। एकेडमी ने बच्चों को बहुत ज़्यादा AI कंटेंट देखने से बचने को कहा है और अधिक शॉर्ट्स न देखने की भी सलाह दी है। 

 गाइडलाइन क्या कहती है?

  • 2 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को स्क्रीन से दूर रखें

  • 6–12 वर्ष के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम सीमित करें

  • शॉर्ट वीडियो कंटेंट कम से कम दिखाएँ

  • बच्चों के साथ बैठकर कंटेंट देखें

  • डिजिटल मीडिया लिटरेसी सिखाएँ

AI content के इस दौर में बच्चों को डिजिटल फ्री एंवायरनमेंट से बचाना मुश्किल है, लेकिन यह उनके माता-पिता और आसपास मौजूद लोगों की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वे उन पर नजर रखें और एक हेल्दी एंवायरनमेंट बनाने की कोशिश करें।

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