भारत में मनाए जाने वाले पर्व केवल परंपराओं तक सीमित नहीं होते, बल्कि उनके पीछे गहरा खगोलीय, प्राकृतिक और धार्मिक आधार छिपा होता है। मकर संक्रांति भी ऐसा ही एक अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व है, जिसका सीधा संबंध सूर्य की गति से जुड़ा हुआ है। यह पर्व उस विशेष क्षण को दर्शाता है जब सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसी खगोलीय घटना के कारण इसे मकर संक्रांति कहा जाता है।

लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि मकर संक्रांति कभी 14 जनवरी को तो कभी 15 जनवरी को क्यों मनाई जाती है। बहुत से लोगों को यह बदलाव अचानक और भ्रमित करने वाला लगता है। कुछ दशक पहले तक यह पर्व अधिकतर 14 जनवरी को ही मनाया जाता था, इसलिए लोगों की स्मृति में यही तारीख स्थिर हो गई। लेकिन समय के साथ जब कभी यह पर्व 15 जनवरी को आता है, तो लोगों को लगता है कि शायद परंपरा बदल दी गई है या पंचांग में कोई गड़बड़ी हो गई है।

वास्तव में यह बदलाव किसी मनमाने फैसले या परंपरा में बदलाव की वजह से नहीं हो रहा है। इसके पीछे प्रकृति के नियम, सूर्य की वास्तविक गति और पृथ्वी की चाल से जुड़ा गहरा विज्ञान काम करता है। सूर्य जिस समय मकर राशि में प्रवेश करता है, वह समय हर वर्ष बिल्कुल समान नहीं होता। यह प्रवेश कभी दिन में होता है, कभी रात में और कभी देर शाम, जिसके कारण तिथि बदल जाती है।

इसके अलावा हिन्दू पर्वों की तारीख तय करने की पद्धति ग्रेगोरियन कैलेंडर से अलग होती है। हिन्दू पंचांग सूर्य और चंद्रमा की वास्तविक स्थिति के आधार पर गणना करता है, जबकि ग्रेगोरियन कैलेंडर निश्चित तारीखों पर आधारित होता है। इसी अंतर की वजह से मकर संक्रांति की तारीख में धीरे-धीरे बदलाव दिखाई देता है और लोगों के बीच भ्रम की स्थिति बन जाती है।


मकर संक्रांति क्या दर्शाती है

मकर संक्रांति का सीधा संबंध सूर्य से है। इस दिन सूर्य धनु राशि से निकलकर मकर राशि में प्रवेश करता है। इसे सूर्य का उत्तरायण होना भी कहा जाता है। उत्तरायण का समय हिन्दू धर्म में अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि इसके बाद दिन बड़े होने लगते हैं और रातें छोटी होने लगती हैं।

यह पर्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि प्रकृति से भी जुड़ा हुआ है। किसान इस समय नई फसल का स्वागत करते हैं और इसे ऋतु परिवर्तन का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि भारत के अलग-अलग हिस्सों में मकर संक्रांति अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाई जाती है।


कभी 14 तो कभी 15 जनवरी क्यों?

पहले मकर संक्रांति लगभग हमेशा 14 जनवरी को मनाई जाती थी। लेकिन समय के साथ सूर्य की स्थिति में सूक्ष्म बदलाव होते गए। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा जिस समय में करती है, वह ठीक 365 दिन नहीं बल्कि उससे थोड़ा अधिक होती है।

इस अतिरिक्त समय के कारण हर साल सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का समय थोड़ा आगे खिसकता जाता है। यही वजह है कि कई वर्षों बाद मकर संक्रांति 14 की बजाय 15 जनवरी को पड़ने लगी। आने वाले समय में यह पर्व 16 जनवरी को भी आ सकता है।


सूर्य की गति और खगोलीय कारण

Earth's orbit and zodiac alignment (1)

सूर्य की गति को मापने के लिए हिन्दू पंचांग में अत्यंत सूक्ष्म गणनाएं की जाती हैं। सूर्य जब एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है, उसी क्षण संक्रांति होती है। यह समय हर साल एक जैसा नहीं होता।

कभी यह प्रवेश सुबह होता है, कभी दोपहर में और कभी रात में। इसी समय के आधार पर तय किया जाता है, कि पर्व किस तारीख को मनाया जाएगा। यदि सूर्य का प्रवेश रात में होता है, तो कई स्थानों पर पर्व अगले दिन मनाया जाता है।


हिन्दू पंचांग कैसे तय करता है तारीख

हिन्दू पंचांग पूरी तरह चंद्र और सौर गणना पर आधारित होता है। इसमें तिथि, नक्षत्र, योग और करण के आधार पर पर्वों की तारीख तय की जाती है। मकर संक्रांति विशुद्ध रूप से सौर पर्व है, इसलिए इसकी तारीख सूर्य की स्थिति से तय होती है, न कि चंद्रमा से।

यही कारण है कि दीपावली, होली जैसे पर्व हर साल बदलते रहते हैं, जबकि मकर संक्रांति लंबे समय तक एक ही तारीख के आसपास रहती है और धीरे-धीरे आगे बढ़ती है।


लीप वर्ष का भी पड़ता है असर

हर 4 साल में आने वाला लीप वर्ष भी तारीखों को प्रभावित करता है। पृथ्वी की सूर्य के चारों ओर परिक्रमा में लगने वाले अतिरिक्त समय को संतुलित करने के लिए कैलेंडर में एक दिन जोड़ा जाता है।

इस संतुलन के बावजूद खगोलीय गणना पूरी तरह समान नहीं रह पाती, जिससे सूर्य के राशि परिवर्तन का समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता जाता है।


क्या आगे भी तारीख बदलती रहेगी?

हां, खगोलीय गणना के अनुसार आने वाले वर्षों में मकर संक्रांति की तारीख और आगे बढ़ सकती है। कई सौ वर्षों बाद यह पर्व जनवरी के मध्य से आगे भी जा सकता है।

हालांकि यह बदलाव बहुत धीरे होता है, इसलिए एक पीढ़ी में इसे महसूस करना मुश्किल होता है।


मकर संक्रांति का धार्मिक महत्व

  1. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उत्तरायण का समय देवताओं का दिन माना जाता है।
  2. मकर संक्रांति से सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है, जिसे अत्यंत शुभ माना जाता है।
  3. इस दिन स्नान, दान और पुण्य कर्म करने का विशेष महत्व बताया गया है।
  4. माना जाता है कि मकर संक्रांति के दिन किए गए दान से विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
  5. इस अवसर पर तिल, गुड़ और खिचड़ी का सेवन करना धार्मिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है।
  6. तिल और गुड़ का सेवन ऋतु के अनुसार स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी बताया गया है।

अलग-अलग राज्यों में मकर संक्रांति

भारत के अलग-अलग हिस्सों में मकर संक्रांति अलग नामों से जानी जाती है। कहीं यह फसल पर्व के रूप में मनाई जाती है तो कहीं धार्मिक अनुष्ठानों के साथ।

हालांकि नाम और परंपराएं अलग हो सकती हैं, लेकिन सूर्य के मकर राशि में प्रवेश का महत्व हर जगह समान रहता है।


निष्कर्ष

मकर संक्रांति की तारीख बदलना कोई परंपरागत भ्रम नहीं, बल्कि खगोलीय और प्राकृतिक नियमों का परिणाम है। सूर्य की चाल, पृथ्वी की गति और हिन्दू पंचांग की गणना मिलकर यह तय करती है कि यह पर्व 14 जनवरी को मनाया जाएगा या 15 जनवरी को। इस बदलाव को समझना हमें भारतीय परंपराओं की वैज्ञानिक सोच से जोड़ता है।