श्रीराम मंदिर रायपुर में सामाजिक सद्भाव बैठक, 500 से अधिक समाजों के प्रतिनिधि हुए शामिल

रायपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत की गरिमामयी उपस्थिति में गुरुवार को श्रीराम मंदिर परिसर में सामाजिक सद्भाव बैठक का आयोजन हुआ। इस महत्वपूर्ण आयोजन में विभिन्न जाति, समाज और पंथों के 500 से अधिक प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। बैठक का उद्देश्य समाज में व्याप्त चुनौतियों पर सामूहिक चिंतन करते हुए सामाजिक एकता और आपसी सद्भाव को और अधिक सुदृढ़ बनाना रहा।

अपने संबोधन में सरसंघचालक मोहन भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका सामाजिक सद्भाव है और इसी के माध्यम से हर प्रकार की चुनौती का समाधान संभव है। उन्होंने कहा कि भारत में विविध आस्थाओं और आचरणों के बावजूद लोग सदियों से एक-दूसरे के साथ सम्मान और अपनत्व के भाव से रहते आए हैं। उन्होंने घरेलू जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि हमारे समाज में घर का काम करने वाले व्यक्ति को भी परिवार के सदस्य की तरह सम्मान दिया जाता है और बच्चे उसे चाचा कहकर संबोधित करते हैं। यही भाव भारत की सामाजिक संरचना की आत्मा है।

मोहन भागवत ने देश के स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा करते हुए कहा कि अंग्रेज स्वेच्छा से भारत छोड़कर नहीं गए, बल्कि भारतवासियों ने एकजुट होकर संघर्ष किया। उन्होंने कहा कि हमारी एकता और अखंडता को कमजोर करने के लिए औपनिवेशिक शक्तियों ने समाज में भेद पैदा करने के प्रयास किए, लेकिन समय-समय पर भारतीय समाज ने उन प्रयासों को विफल किया है। उन्होंने यह भी कहा कि अपनी विशिष्टताओं के साथ आगे बढ़ने की पूर्ण स्वतंत्रता भारत की परंपरा है, लेकिन इसके साथ ही दूसरे की अस्मिता और सम्मान की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है।

सरसंघचालक ने आगाह किया कि समाज को तोड़ने वाली शक्तियां हमेशा सक्रिय रहती हैं, लेकिन जहां संगठन और सद्भावना मजबूत होती है, वहां ऐसे प्रयास सफल नहीं हो पाते। उन्होंने कहा कि लव जिहाद, मतांतरण और व्यसन जैसी समस्याओं पर समाज को जागरूक करना होगा। उन्होंने विशेष रूप से कहा कि अकेलेपन की भावना व्यक्ति को व्यसन की ओर धकेलती है, इसलिए समाज को एक-दूसरे का सहारा बनना चाहिए।

बैठक के दौरान मोहन भागवत ने समाज के दुर्बल और वंचित वर्गों के सशक्तिकरण पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि यदि हम समर्थ हैं तो हमारा सामर्थ्य समाज के कमजोर वर्गों के उपयोग में आना चाहिए। उन्होंने समाज की तुलना शरीर से करते हुए कहा कि जैसे शरीर के सभी अंग मिलकर एक इकाई बनाते हैं, वैसे ही जाति और पंथ समाज के अंग हैं, लेकिन समाज और राष्ट्र एक हैं। उन्होंने यह विचार रखने का आग्रह किया कि हम अपनी जाति या बिरादरी की उन्नति के साथ-साथ बड़े समाज और जिस क्षेत्र में रहते हैं, उसकी उन्नति के लिए क्या कर सकते हैं।

सरसंघचालक ने सामाजिक जीवन को मजबूत करने के लिए घर से शुरुआत करने पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सप्ताह में एक दिन परिवार के सभी सदस्यों को एकत्र होकर भजन, सामूहिक भोजन और संवाद करना चाहिए। इस संवाद में परिवार की परंपराओं, पूर्वजों के संस्कारों और देश से जुड़े विषयों पर चर्चा होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इस प्रकार का मंगल संवाद परिवार को जोड़ता है और समाज के लिए भी प्रेरक बनता है।

पर्यावरण संरक्षण को लेकर मोहन भागवत ने कहा कि जल संरक्षण, प्लास्टिक के उपयोग में कमी और वृक्षारोपण जैसे कार्य हर व्यक्ति व्यक्तिगत स्तर पर कर सकता है। उन्होंने मातृभाषा के प्रयोग और भारतीय भाषाओं के संरक्षण पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि घर में मातृभाषा में संवाद होना चाहिए, भारतीय वेशभूषा अपनानी चाहिए और अपने आदर्शों, महापुरुषों व संतों को स्मरण में रखना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि देश-दुनिया की यात्रा के साथ-साथ अपने आसपास की बस्तियों और झुग्गियों से भी जुड़ाव होना चाहिए, क्योंकि वे भी हमारे समाज का अभिन्न हिस्सा हैं।

संविधान और सामाजिक मूल्यों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि प्रत्येक नागरिक को संविधान की प्रस्तावना, मौलिक अधिकार, नागरिक कर्तव्य और नीति निर्देशक तत्वों की जानकारी होनी चाहिए। देश के सभी नियम-कानूनों का पालन करना आवश्यक है, वहीं कुछ सामाजिक मूल्य लिखित न होने के बावजूद समाज को जोड़ने का कार्य करते हैं। बच्चों द्वारा बड़ों का सम्मान, आपसी सहयोग और विनम्रता जैसे गुण समाज में सद्भाव को मजबूत करते हैं।

इस अवसर पर सरसंघचालक मोहन भागवत ने विभिन्न जाति, पंथ और समाजों के प्रतिनिधियों के साथ पंगत में बैठकर भोजन किया, जो सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण बना। बैठक में विभिन्न समाजों के प्रतिनिधियों ने अपने-अपने क्षेत्रों में किए जा रहे सामाजिक कार्यों के प्रेरक अनुभव साझा किए। कार्यक्रम की प्रस्तावना मध्यक्षेत्र के क्षेत्र संघचालक डॉ. पूर्णेन्दु सक्सेना ने रखी, जबकि प्रांत संघचालक टोपलाल ने आभार व्यक्त किया।

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