‘परीक्षा पे चर्चा’ में छात्रों से संवाद करते हुए प्रधानमंत्री ने तनावमुक्त शिक्षा, संतुलित जीवन और भविष्य की तैयारी का दिया संदेश

नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ‘परीक्षा पे चर्चा’ के नौवें संस्करण में देश के विभिन्न राज्यों से आए छात्रों से सीधे संवाद करते हुए शिक्षा, परीक्षा और जीवन से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर खुलकर बात की। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि परीक्षा कभी भी जीवन का अंतिम लक्ष्य नहीं हो सकती। शिक्षा का उद्देश्य केवल अंक अर्जित करना नहीं, बल्कि व्यक्ति का सर्वांगीण विकास होना चाहिए, जिससे वह जीवन की हर चुनौती का आत्मविश्वास के साथ सामना कर सके।

प्रधानमंत्री ने छात्रों को यह संदेश दिया कि परीक्षा को बोझ या डर के रूप में देखने के बजाय उसे सीखने और आत्ममूल्यांकन का एक अवसर माना जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन केवल परीक्षा केंद्रित नहीं है और न ही असफलता किसी की क्षमता का अंतिम पैमाना हो सकती है। शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य चरित्र निर्माण, कौशल विकास और सकारात्मक सोच को मजबूत करना है।

बीते समय की चिंता छोड़ आगे की राह पर ध्यान देने की सलाह

कार्यक्रम के दौरान मणिपुर की एक छात्रा द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री ने समय के महत्व पर गहरी बात कही। उन्होंने कहा कि जो बीत गया है, उसकी लगातार गिनती करने से केवल समय और ऊर्जा की बर्बादी होती है। अपने जीवन का उदाहरण साझा करते हुए उन्होंने बताया कि 17 सितंबर को उनके जन्मदिन पर एक नेता ने उन्हें फोन कर कहा कि अब आप 75 वर्ष के हो गए हैं। इस पर उनका जवाब था कि अभी 25 वर्ष बाकी हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि वे बीते वर्षों को नहीं गिनते, बल्कि शेष समय को बेहतर तरीके से जीने और उसका उपयोग करने पर ध्यान देते हैं।

उन्होंने छात्रों से भी यही दृष्टिकोण अपनाने की अपील की और कहा कि परीक्षा में जो परिणाम आया है, उस पर अटकने के बजाय आगे बचे समय को कैसे बेहतर बनाया जाए, इस पर सोचना अधिक जरूरी है। यही सोच व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रेरणा देती है।

MODI AT PARIKSHA P CHARCHA
MODI AT PARIKSHA P CHARCHA Photograph: (X)

अंक नहीं, व्यक्तित्व निर्माण है शिक्षा का असली उद्देश्य

प्रधानमंत्री ने शिक्षा व्यवस्था पर बात करते हुए कहा कि अच्छे शिक्षक वही होते हैं, जो छात्रों को केवल अच्छे अंक दिलाने तक सीमित नहीं रहते, बल्कि उनके संपूर्ण व्यक्तित्व के विकास पर ध्यान देते हैं। उन्होंने कहा कि शिक्षा जीवन निर्माण का माध्यम है, न कि केवल डिग्री या प्रमाणपत्र हासिल करने का जरिया। जीवन में आने वाली परीक्षाएं हमें खुद को परखने और सुधारने का अवसर देती हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि माता-पिता और शिक्षक दोनों की भूमिका छात्रों के लिए मार्गदर्शक की होती है, दबाव बनाने वाली नहीं। जब शिक्षा आनंद का विषय बन जाती है, तब सीखने की प्रक्रिया स्वाभाविक और प्रभावी हो जाती है।

अध्ययन पद्धति को लेकर भ्रम स्वाभाविक

विभिन्न अध्ययन पद्धतियों को लेकर छात्रों में होने वाले भ्रम पर प्रधानमंत्री ने कहा कि यह स्थिति केवल छात्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि जीवन भर बनी रहती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद भी उन्हें अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से काम करने की सलाह देते हैं। सलाह सुनना जरूरी है, लेकिन अंतिम निर्णय वही होना चाहिए, जो व्यक्ति के स्वभाव, परिस्थितियों और क्षमताओं के अनुरूप हो।

उन्होंने छात्रों से कहा कि किसी और की नकल करने के बजाय अपनी सीखने की शैली को पहचानें और उसी के अनुसार तैयारी करें। यही तरीका लंबे समय तक उपयोगी साबित होता है।

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MODI AT PARIKSHA P CHARCHA Photograph: (X)

शिक्षक और छात्र: दोनों के लिए संतुलन जरूरी

एक छात्र द्वारा शिक्षक के बहुत तेज पढ़ाने की शिकायत पर प्रधानमंत्री ने संतुलित दृष्टिकोण से जवाब दिया। उन्होंने कहा कि शिक्षक को छात्रों से एक कदम आगे रहना चाहिए, ताकि लक्ष्य चुनौतीपूर्ण बना रहे। वहीं छात्रों को भी सलाह दी कि वे कक्षा में पढ़ाए जाने वाले पाठ को पहले से देखकर जाएं, जिससे वे शिक्षक से दो कदम आगे रह सकें। इस तरह सीखने की प्रक्रिया और अधिक प्रभावी बनती है।

जीवन कौशल और पेशेवर कौशल दोनों अहम

कौशल विकास पर बोलते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि जीवन कौशल और पेशेवर कौशल दोनों का समान महत्व है। उन्होंने संतुलन का उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे शरीर का संतुलन बिगड़ने पर व्यक्ति गिर जाता है, वैसे ही जीवन में किसी एक पक्ष पर अत्यधिक जोर नुकसानदेह हो सकता है। शिक्षा के साथ-साथ व्यवहार, अनुशासन, समय प्रबंधन और आत्मनियंत्रण जैसे गुण भी उतने ही जरूरी हैं।

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गेमिंग को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण

गेमिंग से जुड़े सवाल पर प्रधानमंत्री ने कहा कि गेमिंग केवल समय की बर्बादी नहीं है, बल्कि यह एक कौशल भी हो सकता है। उन्होंने कहा कि यदि इसे सही दिशा में अपनाया जाए तो यह व्यक्तित्व विकास में सहायक बन सकता है। प्रधानमंत्री ने छात्रों को केवल गेम खेलने तक सीमित न रहने, बल्कि गेम निर्माता बनने की सलाह दी। उन्होंने भारतीय संस्कृति, इतिहास और कथाओं पर आधारित खेल विकसित करने की आवश्यकता पर जोर दिया, जिससे दुनिया भारत की सांस्कृतिक विरासत से भी परिचित हो सके।

तनावमुक्त पढ़ाई और आत्ममंथन की आदत

प्रधानमंत्री ने कहा कि शिक्षा कभी भी बोझ नहीं लगनी चाहिए। उन्होंने छात्रों को प्रतिदिन सोने से पहले अगले दिन के कार्यों की एक सूची बनाने और दिन के अंत में आत्ममंथन करने की सलाह दी। इससे न केवल समय प्रबंधन बेहतर होता है, बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

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सांस्कृतिक विविधता और पूर्वोत्तर का संदेश

कार्यक्रम के दौरान सिक्किम की छात्रा श्रिया प्रधान ने हिंदी, नेपाली और बंगाली भाषाओं में स्वरचित गीत प्रस्तुत किया, जिसकी प्रधानमंत्री ने सराहना की। उन्होंने असम के गमछा का उल्लेख करते हुए उसे नारी सशक्तीकरण, श्रम और पूर्वोत्तर की कारीगरी का प्रतीक बताया। कार्यक्रम की शुरुआत में सभी छात्रों को असम का गमछा भेंट किया गया, जो सांस्कृतिक एकता का संदेश था।

विकसित भारत की तैयारी का आह्वान

प्रधानमंत्री ने छात्रों से विकसित भारत के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2047 में यही छात्र देश की सबसे सक्रिय और निर्णायक पीढ़ी होंगे। इसलिए उन्हें अभी से अपने लक्ष्य, कौशल और जिम्मेदारियों के प्रति सजग रहना चाहिए। शिक्षा, अनुशासन और सकारात्मक सोच ही उन्हें उस भूमिका के लिए तैयार करेगी।

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