अमेरिका की रणनीतिक नजर, आर्कटिक में बढ़ती भू-राजनीतिक हलचल

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने एक बार फिर ग्रीनलैंड को लेकर अपनी पुरानी इच्छा दोहराते हुए कहा है कि “कुछ न कुछ हल जरूर निकलेगा।” व्हाइट हाउस में अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड के शीर्ष अधिकारियों के बीच हुई उच्चस्तरीय बैठक के बाद ट्रम्प ने स्पष्ट संकेत दिए कि ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। ट्रम्प ने ग्रीनलैंड को अमेरिका के महत्वाकांक्षी मिसाइल रक्षा कार्यक्रम “गोल्डन डोम” के लिए निर्णायक कड़ी बताया, जिसे चीन और रूस जैसे देशों से संभावित खतरों से निपटने की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है।

ट्रम्प का यह बयान ऐसे समय आया है, जब आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक शक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा का नया केंद्र बनता जा रहा है। पिघलती बर्फ, नए समुद्री मार्ग और प्राकृतिक संसाधनों की संभावनाओं ने इस इलाके को सामरिक रूप से बेहद अहम बना दिया है। अमेरिका, रूस, चीन और यूरोपीय देश—सभी की निगाहें अब आर्कटिक पर टिकी हैं।


गोल्डन डोम क्या है और ग्रीनलैंड क्यों अहम

गोल्डन डोम अमेरिका का प्रस्तावित मिसाइल रक्षा प्रोजेक्ट है, जिसे इजराइल के आयरन डोम मॉडल से प्रेरित बताया जा रहा है। इसका उद्देश्य लंबी दूरी की मिसाइलों और अंतरमहाद्वीपीय खतरों की समय रहते पहचान और उन्हें नष्ट करना है। ट्रम्प का तर्क है कि ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति—खासकर उत्तरी ध्रुव के पास—अमेरिका को रूस और चीन की ओर से आने वाले संभावित मिसाइल खतरों की शुरुआती चेतावनी देने में मदद कर सकती है। इसी वजह से उन्होंने ग्रीनलैंड को गोल्डन डोम के लिए “बहुत महत्वपूर्ण” बताया।

ट्रम्प ने यहां तक कहा कि अगर अमेरिका ने ग्रीनलैंड में अपनी पकड़ मजबूत नहीं की, तो रूस या चीन वहां प्रभाव बढ़ा सकते हैं। उनके मुताबिक, यह स्थिति न केवल अमेरिका बल्कि पूरे पश्चिमी गठबंधन के लिए खतरा बन सकती है।


व्हाइट हाउस की बैठक: बात हुई, समझौता नहीं

व्हाइट हाउस में हुई इस महत्वपूर्ण बैठक में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो, उपराष्ट्रपति जेडी वेंस, डेनमार्क के विदेश मंत्री लार्स लोक्के रासमुसेन और ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्जफेल्ट शामिल हुईं। बैठक के बाद कोई बड़ा समझौता सामने नहीं आया, लेकिन यह तय हुआ कि ग्रीनलैंड से जुड़े मुद्दों पर आगे चर्चा के लिए एक संयुक्त वर्किंग ग्रुप बनाया जाएगा, जिसकी बैठकें आने वाले हफ्तों में होंगी।

डेनमार्क और ग्रीनलैंड दोनों ने इस दौरान साफ कर दिया कि अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाना अलग बात है, लेकिन ग्रीनलैंड पर अमेरिकी प्रभुत्व स्वीकार करना असंभव है।


ग्रीनलैंड का स्पष्ट संदेश: सहयोग हां, गुलामी नहीं

बैठक के बाद ग्रीनलैंड की विदेश मंत्री विवियन मोट्जफेल्ट ने दो टूक शब्दों में कहा कि अमेरिका के साथ रिश्ते मजबूत करना उनके हित में है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ग्रीनलैंड अपनी संप्रभुता छोड़ दे। उनका बयान इस बात का संकेत था कि ग्रीनलैंड रणनीतिक सहयोग के लिए तैयार है, पर राजनीतिक नियंत्रण के सवाल पर कोई समझौता नहीं करेगा।

डेनमार्क के विदेश मंत्री रासमुसेन ने भी ट्रम्प के ग्रीनलैंड को खरीदने या कब्जे में लेने के विचार को पूरी तरह अस्वीकार्य बताया। उन्होंने कहा कि यह न तो डेनमार्क के हित में है और न ही ग्रीनलैंड की जनता की इच्छा के अनुरूप।


NATO को ट्रम्प की खुली अपील

ट्रम्प ने इस मुद्दे पर NATO को भी सीधे तौर पर घसीटते हुए कहा कि अगर अमेरिका ग्रीनलैंड को अपने प्रभाव में लाता है तो इससे NATO और मजबूत होगा। उन्होंने दावा किया कि ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण से पूरे गठबंधन की सुरक्षा क्षमता बढ़ेगी। ट्रम्प के अनुसार, NATO को इस दिशा में अमेरिका की मदद करनी चाहिए।

यह बयान यूरोपीय देशों के लिए असहज करने वाला है, क्योंकि ग्रीनलैंड डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है और NATO के भीतर इस तरह का दबाव आंतरिक मतभेद पैदा कर सकता है।


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यूरोप की प्रतिक्रिया: सैन्य मौजूदगी बढ़ाने की तैयारी

ट्रम्प के बयानों के बीच यूरोपीय देशों ने भी आर्कटिक में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। स्वीडन के प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टर्सन ने बताया कि डेनमार्क के अनुरोध पर स्वीडिश सशस्त्र बलों के अधिकारी ग्रीनलैंड में एक सैन्य अभ्यास में शामिल हो रहे हैं। इसके अलावा फ्रांस और जर्मनी ने भी ग्रीनलैंड में सैन्यकर्मी भेजने की घोषणा की है।

जर्मन विदेश मंत्रालय ने कहा कि वह क्षेत्रीय सुरक्षा को मजबूत करने के लिए 13 सदस्यों की एक टीम भेजेगा। नॉर्वे के रक्षा मंत्री टोरे सैंडविक के मुताबिक, नॉर्डिक देश NATO सदस्यों के बीच आर्कटिक सुरक्षा सहयोग को मजबूत करने के लिए ग्रीनलैंड में दो सैन्यकर्मी तैनात करेगा।


ग्रीनलैंड की स्थिति: सेना नहीं, लेकिन रणनीतिक केंद्र

ग्रीनलैंड की अपनी कोई स्थायी सेना नहीं है। उसकी रक्षा और विदेश नीति की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है। यह डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है, जहां की आबादी लगभग 57 हजार है। 2009 के बाद ग्रीनलैंड को तटीय सुरक्षा और कुछ विदेशी मामलों में सीमित स्वायत्तता मिली, लेकिन रक्षा और मुख्य विदेश नीति अभी भी डेनमार्क के नियंत्रण में है।

अमेरिका की मौजूदगी की बात करें तो ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिम में स्थित थुले एयर बेस—जिसे अब पिटुफिक स्पेस बेस कहा जाता है—अमेरिका का सबसे उत्तरी सैन्य अड्डा है। यहां करीब 150 से 200 अमेरिकी सैनिक तैनात बताए जाते हैं, जो मिसाइल चेतावनी, अंतरिक्ष निगरानी और आर्कटिक सुरक्षा में अहम भूमिका निभाते हैं। वहीं, डेनमार्क की जॉइंट आर्कटिक कमांड के तहत लगभग 150 से 200 डेनिश सैन्य और नागरिक कर्मी गश्त, खोज-बचाव और संप्रभुता की रक्षा में लगे हैं। इसमें प्रसिद्ध सीरियस डॉग स्लेज पेट्रोल जैसी छोटी लेकिन विशेष इकाई भी शामिल है।


तस्वीर के जरिए संदेश: दबाव की नई रणनीति

बैठक के बाद व्हाइट हाउस द्वारा सोशल मीडिया पर साझा की गई एक तस्वीर ने भी खूब चर्चा बटोरी। तस्वीर में ग्रीनलैंड के झंडे लगी दो स्लेज दिखाई गईं—एक रास्ता व्हाइट हाउस और अमेरिकी झंडे की ओर जाता है, जबकि दूसरा अंधेरे और बिजली की ओर, जहां चीन और रूस के झंडे लगे हैं। कैप्शन था—“ग्रीनलैंड, तुम किस तरफ जाओगे?”

इस प्रतीकात्मक संदेश के जरिए अमेरिका ने यह संकेत देने की कोशिश की कि उसके साथ रहने का मतलब सुरक्षा और स्थिरता है, जबकि चीन या रूस की ओर झुकाव खतरे से भरा हो सकता है। आलोचकों का कहना है कि यह ग्रीनलैंड पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश है।


कुल मिलाकर, ट्रम्प के ताजा बयानों ने ग्रीनलैंड को एक बार फिर वैश्विक राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है। जहां अमेरिका इसे अपनी सुरक्षा रणनीति का अहम हिस्सा मान रहा है, वहीं डेनमार्क और ग्रीनलैंड संप्रभुता से कोई समझौता करने को तैयार नहीं दिखते। आने वाले हफ्तों में बनने वाला संयुक्त वर्किंग ग्रुप इस टकराव को संवाद के जरिए सुलझा पाएगा या नहीं, यह देखना अहम होगा, क्योंकि आर्कटिक में बढ़ती हलचल आने वाले समय में वैश्विक संतुलन को गहराई से प्रभावित कर सकती है।

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