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औपनिवेशिक काल का एक और प्रतीक ध्वस्त 

“केरल” से “केरलम” नाम का प्रस्ताव केवल एक भाषाई संशोधन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान, राजनीतिक आत्मविश्वास और रणनीतिक पहचान का प्रतीक है। यह कदम दर्शाता है कि भारत के राज्य अब केवल प्रशासनिक इकाइयां नहीं हैं, बल्कि अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ वैश्विक मंच पर स्थापित होने की दिशा में अग्रसर हैं।

आने वाले समय में यह परिवर्तन न केवल केरल की पहचान को और अधिक प्रामाणिक बनाएगा, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता और संघीय शक्ति को भी नई मजबूती प्रदान करेगा।
केरल ने हाल ही में अपने आधिकारिक नाम को अंग्रेज़ी में भी “Keralam” करने का प्रस्ताव पारित कर एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक और राजनीतिक बहस को जन्म दिया है। पहली नजर में यह एक साधारण भाषाई संशोधन प्रतीत हो सकता है, लेकिन इसके निहितार्थ कहीं अधिक व्यापक हैं। यह कदम न केवल सांस्कृतिक पहचान के पुनर्स्थापन का प्रयास है, बल्कि संघीय ढांचे, क्षेत्रीय राजनीति और वैश्विक ब्रांडिंग के संदर्भ में भी दूरगामी प्रभाव रखने वाला निर्णय है।

केरल से केरलम: नाम बदलने का पूरा मामला, इतिहास, कारण और प्रक्रिया, Kerala  to Keralam Name Change Explained: History, Reason & Legal Process

“केरलम” इस राज्य का मूल और पारंपरिक नाम है, जो मलयालम भाषा में सदियों से प्रचलित है।औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने इसे “केरल” के रूप में सरल किया, जो धीरे-धीरे आधिकारिक और अंतरराष्ट्रीय उपयोग में स्थापित हो गया। अब “केरलम” नाम को पुनर्स्थापित करने का प्रयास एक प्रकार से औपनिवेशिक विरासत से बाहर निकलकर अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान को पुनर्जीवित करने का प्रतीक है।
यह कदम उस व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें भारत के विभिन्न शहरों और राज्यों ने अपने पारंपरिक नामों को पुनः अपनाया है। जैसे बॉम्बे से मुंबई, मद्रास से चेन्नई और उड़ीसा से ओडिशा का परिवर्तन हुआ। इन परिवर्तनों का उद्देश्य केवल नाम बदलना नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक स्वाभिमान को पुनः स्थापित करना था।

राजनीतिक दृष्टि से निहित संदेश

राजनीतिक रूप से यह निर्णय क्षेत्रीय पहचान को सुदृढ़ करने का एक प्रभावी माध्यम है। क्षेत्रीय दलों और राज्य सरकारों के लिए यह एक अवसर होता है कि वे अपनी स्थानीय भाषा, संस्कृति और परंपरा के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करें। इससे जनता के बीच भावनात्मक जुड़ाव मजबूत होता है और राजनीतिक वैधता को बल मिलता है।
साथ ही, यह निर्णय भारत के संघीय ढांचे की उस मूल भावना को भी रेखांकित करता है, जिसमें राज्यों को अपनी सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को संरक्षित और प्रोत्साहित करने का अधिकार प्राप्त है। यह केंद्र और राज्यों के बीच संतुलित शक्ति संरचना का भी संकेत देता है।

वैश्विक स्तर पर भी नाम परिवर्तन का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। जब कोई क्षेत्र अपने मूल नाम को अपनाता है, तो वह अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान को विश्व मंच पर अधिक प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है। उदाहरण के लिए, सीलोन का श्रीलंका और बर्मा  का म्यांमार बनना केवल नाम परिवर्तन नहीं था, बल्कि राष्ट्रीय पहचान और संप्रभुता का पुनर्परिभाषण था।

केरल, जो ऐतिहासिक रूप से मसालों के व्यापार और समुद्री संपर्क का प्रमुख केंद्र रहा है, आज भी पर्यटन और अंतरराष्ट्रीय संपर्क के दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है। “केरलम” नाम इस राज्य की प्रामाणिक और विशिष्ट पहचान को और अधिक सशक्त बना सकता है, जिससे वैश्विक स्तर पर इसकी ब्रांडिंग को लाभ मिल सकता है।
यह निर्णय भविष्य में अन्य राज्यों को भी अपनी मूल सांस्कृतिक पहचान को पुनर्स्थापित करने के लिए प्रेरित कर सकता है। इससे भारत की विविधता और संघीय संरचना और अधिक सुदृढ़ हो सकती है। साथ ही, यह प्रवृत्ति यह भी दर्शाती है कि भारत में सांस्कृतिक पुनर्जागरण और स्थानीय पहचान की राजनीति भविष्य में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकती है।

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