वैधानिक शक्तियों के दुरुपयोग के आरोप, मुख्य सचिव को कार्रवाई के निर्देश
नई दिल्ली । भारत निर्वाचन आयोग ने पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान कथित गंभीर लापरवाही के आरोप में सात अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। आयोग का कहना है कि मतदाता सूची से जुड़ा कार्य अत्यंत संवेदनशील होता है और इसमें किसी भी प्रकार की चूक लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रभाव डाल सकती है। इसलिए जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया गया है। आयोग ने राज्य के मुख्य सचिव को निर्देश दिए हैं कि निलंबित अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार आगे की कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि कर्तव्य की अनदेखी और वैधानिक अधिकारों के दुरुपयोग को किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। आयोग ने चेतावनी दी है कि भविष्य में भी यदि ऐसी शिकायतें सामने आती हैं तो कठोर कदम उठाए जाएंगे।
संवेदनशील प्रक्रिया पर सख्त संदेश
निर्वाचन से पहले मतदाता सूची का अद्यतन सबसे महत्वपूर्ण चरणों में माना जाता है। इसी के आधार पर मतदान की संपूर्ण व्यवस्था खड़ी होती है। आयोग का मानना है कि यदि इस स्तर पर गड़बड़ी या ढिलाई होती है तो बाद में विवाद की स्थिति बन सकती है। इसलिए अधिकारियों की जवाबदेही तय करना आवश्यक है। सूत्रों के अनुसार पुनरीक्षण के दौरान प्राप्त शिकायतों और निरीक्षण रिपोर्टों के आधार पर यह निर्णय लिया गया।
न्यायिक निगरानी भी जारी
इस बीच सुप्रीम कोर्ट भी इस मुद्दे पर नजर बनाए हुए है। नौ फरवरी को अदालत ने पश्चिम बंगाल में चल रही प्रक्रिया से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया था कि पुनरीक्षण के काम में किसी भी प्रकार की रुकावट स्वीकार नहीं की जाएगी। पीठ ने कहा था कि आवश्यकता पड़ने पर उचित आदेश पारित किए जाएंगे ताकि प्रक्रिया पारदर्शी और समयबद्ध रहे।
अंतिम सूची की समय सीमा बढ़ी
सुनवाई के दौरान अदालत ने अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की समय सीमा में भी बदलाव किया था। पहले यह तिथि चौदह फरवरी निर्धारित थी, जिसे बढ़ाकर इक्कीस फरवरी कर दिया गया। अदालत का उद्देश्य यह था कि सभी पक्षों को अपनी आपत्तियां और दावे रखने का पर्याप्त अवसर मिल सके और बाद में किसी प्रकार का विवाद न उठे।
प्रशासनिक हलकों में हलचल
सात अधिकारियों के निलंबन के फैसले से राज्य के प्रशासनिक तंत्र में हलचल है। यह संदेश साफ है कि चुनाव संबंधी कार्य में लापरवाही के लिए किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। अधिकारियों से अपेक्षा की जा रही है कि वे निर्धारित नियमों के अनुसार पारदर्शिता के साथ कार्य करें और किसी तरह की शिकायत की गुंजाइश न छोड़ें।
आगे की कार्रवाई पर नजर
अब निगाह इस बात पर है कि राज्य प्रशासन आयोग के निर्देशों के तहत क्या कदम उठाता है और जांच में क्या तथ्य सामने आते हैं। यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो संबंधित अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई और कठोर हो सकती है। निर्वाचन आयोग की सख्ती को लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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