पीड़ित-केंद्रित और संवेदनशील न्यायिक प्रक्रिया पर जोर, असंवेदनशील टिप्पणियों पर कड़ी टिप्पणी
नई दिल्ली। यौन अपराधों की सुनवाई को अधिक संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को निर्देश दिया है कि वह ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए व्यापक प्रारूप दिशानिर्देश तैयार करे। अदालत ने स्पष्ट किया कि ये गाइडलाइंस भारतीय समाज की वास्तविक परिस्थितियों, सामाजिक मूल्यों और संवैधानिक भावना को ध्यान में रखकर बनाई जाएं और किसी विदेशी कानूनी मॉडल या शब्दावली की नकल न की जाए।
सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी उस मामले की सुनवाई के दौरान आई, जिसमें इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित आदेश को चुनौती दी गई थी। उक्त आदेश में एक नाबालिग लड़की के साथ की गई गंभीर हरकतों को बलात्कार या बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं माना गया था। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही उस फैसले को त्रुटिपूर्ण बताते हुए निरस्त कर दिया था।
स्वतः संज्ञान से शुरू हुई सुनवाई
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ वर्ष 2025 में स्वतः संज्ञान लिए गए इस मामले की सुनवाई कर रही थी। मामला उस आदेश से जुड़ा था जिसमें नाबालिग पीड़िता के साथ स्तन पकड़ने, उसके वस्त्रों से छेड़छाड़ करने और उसे जबरन घसीटने के प्रयास को गंभीर यौन अपराध की श्रेणी में शामिल नहीं किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि ऐसे मामलों में न्यायालयों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और टिप्पणियां अत्यंत संवेदनशील होनी चाहिए। अदालत ने कहा कि असावधानीपूर्ण या असंवेदनशील टिप्पणियां पीड़ितों को दोबारा मानसिक आघात पहुंचा सकती हैं।
न्यायिक भाषा और दृष्टिकोण पर चिंता
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि कई बार अदालतों में प्रयुक्त भाषा या टिप्पणियां न केवल पीड़िता बल्कि उसके परिवार और व्यापक समाज पर भी भय का प्रभाव डाल सकती हैं। 8 दिसंबर 2025 को दिए गए अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यौन उत्पीड़न मामलों में असंवेदनशील न्यायिक टिप्पणियां समाज में ‘चिलिंग इफेक्ट’ पैदा कर सकती हैं, जिससे पीड़ित आगे आने से हिचक सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने यह संकेत भी दिया कि वह भविष्य में कुछ व्यापक निर्देश जारी करेगा, जिससे निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों को स्पष्ट मार्गदर्शन मिल सके। अब जब राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी को औपचारिक रूप से ड्राफ्ट गाइडलाइन तैयार करने का निर्देश दिया गया है, तो माना जा रहा है कि आने वाले समय में न्यायिक प्रक्रिया में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलेंगे।
भारतीय संदर्भ में तैयार हों दिशानिर्देश
अदालत ने विशेष रूप से कहा कि तैयार की जाने वाली गाइडलाइंस भारतीय समाज की संवेदनशीलता और विविधता को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए। न्यायिक प्रशिक्षण और व्यवहार में पीड़ितों की गरिमा, निजता और सम्मान को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
यह भी स्पष्ट किया गया कि विदेशी कानूनी शब्दावली या मॉडल को सीधे अपनाने के बजाय भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप दिशानिर्देश विकसित किए जाएं। अदालत का मानना है कि न्याय व्यवस्था को समाज के विश्वास को मजबूत करने वाला होना चाहिए, न कि पीड़ितों को हतोत्साहित करने वाला।
व्यापक असर की संभावना
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्देश का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। यदि राष्ट्रीय स्तर पर एकसमान और संवेदनशील दिशानिर्देश लागू होते हैं, तो यौन अपराधों की सुनवाई में भाषा, दृष्टिकोण और प्रक्रिया में सकारात्मक बदलाव आएगा।
यह कदम न केवल न्यायिक जवाबदेही को मजबूत करेगा, बल्कि पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। सुप्रीम कोर्ट का यह रुख इस बात का संकेत है कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायिक प्रक्रिया को अधिक मानवीय और उत्तरदायी बनाने की दिशा में ठोस प्रयास किए जा रहे हैं।
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