त्रिवेणी के तट पर मौन, मर्यादा और व्यवस्था का विराट संगम बना उदाहरण
प्रयागराज। मौनी अमावस्या के अवसर पर तीर्थराज प्रयागराज में जो दृश्य उभरा, उसने सनातन संस्कृति की गहराई, उसकी आत्मानुशासन की परंपरा और सामूहिक चेतना की शक्ति को एक साथ उजागर कर दिया। शनिवार–रविवार की दरमियानी रात से ही संगम तट पर जनसैलाब उमड़ पड़ा। हर घंटे नए रिकॉर्ड बनाते इस रैले में देश-प्रदेश के कोने-कोने से आए श्रद्धालु शामिल थे—कहीं सिर पर गठरी रखे आसपास के गांवों से पैदल आए लोग, तो कहीं विशेष ट्रेनों और बसों से पहुंचे श्रद्धालु। इस विशाल भीड़ में पढ़े-लिखे युवाओं की संख्या भी उल्लेखनीय रही, जो परंपरा और आधुनिकता के सुंदर समन्वय का संकेत देती दिखी।
त्रिवेणी के सान्निध्य में मौन का संकल्प
इस महापर्व का केंद्र बिंदु रहा पवित्र त्रिवेणी—गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का संगम। श्रद्धालुओं ने मौन धारण कर स्नान किया; न कोई शोर, न नारेबाजी, न अव्यवस्था। हर चेहरा मानो एक ही लक्ष्य में रमा था—बिना व्यवधान, बिना प्रदर्शन, केवल श्रद्धा के साथ पुण्य की डुबकी। यह मौन, अपने आप में अनुशासन का घोष था।
अनुशासन की ऐसी मिसाल, जहां भीड़ भी व्यवस्था बनी
इस विराट आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता रही—अनुशासन। न तेज संगीत, न तोड़फोड़, न बैरियरों पर चढ़ने की होड़। प्रशासन द्वारा बनाई गई व्यवस्थाओं का पालन करते हुए श्रद्धालु पंक्तिबद्ध आगे बढ़ते रहे। अनुमानतः एक ही दिन में करीब 4.52 करोड़ श्रद्धालुओं ने स्नान किया, फिर भी कहीं अफरा-तफरी नहीं दिखी। यह दृश्य उन वीआईपी-संस्कृति से प्रभावित, सोशल मीडिया की सुर्खियों में रहने वाले तथाकथित बाबाओं के लिए भी मौन संदेश था—धर्म का सौंदर्य सादगी और मर्यादा में है।
हंगामे से दूर, लक्ष्य पर केंद्रित आस्था
स्नान के बाद लौटते श्रद्धालुओं की आंखों में सिर्फ त्रिवेणी की पवित्र छवि थी। जब शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के रथ को लेकर विवाद की स्थिति बनी, तब भी हजारों श्रद्धालु बिना रुके, बिना जिज्ञासा के आगे बढ़ते रहे। मीडिया में उछलते शोर-शराबे से इतर, श्रद्धालुओं का लक्ष्य स्पष्ट था—स्नान, प्रसाद, और शांति से घर वापसी। स्टेशन से संगम, घाटों से भंडारों तक—हर जगह कतारें और संयम दिखाई दिया।
सेवा में आगे आए युवा, सादगी में दिखा साधु-संतों का आदर्श
जहां कहीं कोई भटका, वहां युवा स्वयं आगे बढ़कर मार्गदर्शन करते दिखे। यह स्वतःस्फूर्त सेवा भाव आयोजन की आत्मा बन गया। इसी क्रम में किन्नर सनातनी अखाड़ा की महामंडलेश्वर ने भी तय नियमों के अनुसार सीमित संख्या में संतों के साथ पैदल, बिना किसी तामझाम और बिना मीडिया इवेंट के स्नान किया और लौट गईं। न शिकायत, न प्रदर्शन—केवल मर्यादा। यह आचरण साधु-संतों के लिए भी एक आदर्श उदाहरण बनकर उभरा।
प्रशासन और समाज की साझा सफलता
प्रशासन की सुस्पष्ट योजना और समाज की अनुशासित भागीदारी ने मिलकर इस महापर्व को सफल बनाया। यदि ऐसी तैयारी हर पर्व पर हो और श्रद्धालु भी इसी तरह संयम बरतें, तो सनातन संस्कृति की यह उजली तस्वीर और व्यापक होगी। तीर्थराज प्रयाग से सदियों से यही संदेश प्रवाहित होता रहा है—आस्था तब और सुंदर होती है, जब वह अनुशासन से सजी हो।
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