बजट सत्र के पांचवें दिन सदन में शोर-शराबा, नियमों की याद दिलाने के बावजूद नहीं थमा विरोध

नई दिल्ली। बजट सत्र के पांचवें दिन लोकसभा में कार्यवाही शुरू होते ही विपक्षी दलों ने जोरदार हंगामा किया। सुबह 11 बजे जैसे ही सदन की कार्यवाही प्रारंभ हुई, विपक्षी सांसदों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ नारेबाजी शुरू कर दी। शोरगुल के कारण सदन केवल कुछ ही मिनट चल सका और स्पीकर को कार्यवाही 12 बजे तक के लिए स्थगित करनी पड़ी।

स्थगन के बाद जब सदन दोबारा बैठा तो हालात में कोई खास बदलाव नहीं दिखा। दूसरी बार भी कार्यवाही महज कुछ ही मिनट चल सकी। विपक्षी सदस्यों का विरोध लगातार जारी रहा, जिससे सदन का संचालन बाधित होता रहा। स्थिति को देखते हुए स्पीकर ने लोकसभा की कार्यवाही दोपहर 2 बजे तक के लिए स्थगित कर दी।

लोकसभा स्पीकर ओम बिरला ने विपक्षी सांसदों से स्पष्ट शब्दों में कहा कि नारेबाजी संसदीय नियमों के विरुद्ध है और इससे सदन की गरिमा प्रभावित होती है। उन्होंने यह भी कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी बात रखने के लिए नियमों के तहत चर्चा और बहस का रास्ता अपनाया जाना चाहिए। इसके बावजूद विपक्षी सांसद शांत नहीं हुए और हंगामा जारी रहा।

सूत्रों के अनुसार, लगातार हो रहे व्यवधान को गंभीरता से लेते हुए स्पीकर ओम बिरला ने कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के सांसदों के साथ बैठक की। इस बैठक का उद्देश्य सदन को सुचारु रूप से चलाने के लिए सहमति बनाना और यह सुनिश्चित करना था कि कार्यवाही बिना बाधा के आगे बढ़ सके। माना जा रहा है कि स्पीकर ने सभी दलों से सहयोग की अपील की और संसद के समय का सदुपयोग करने पर जोर दिया।

संसदीय सूत्र बताते हैं कि बजट सत्र के दौरान महत्वपूर्ण विधायी और आर्थिक मुद्दों पर चर्चा प्रस्तावित है। ऐसे में बार-बार की नारेबाजी और स्थगन से न केवल संसदीय कार्य प्रभावित हो रहा है, बल्कि जनहित से जुड़े विषयों पर चर्चा भी टलती जा रही है। सरकार की ओर से यह संकेत दिया गया कि विपक्ष यदि किसी मुद्दे पर असहमति रखता है तो वह नियमों के तहत नोटिस देकर चर्चा की मांग कर सकता है।

विपक्षी दलों का कहना है कि वे कुछ अहम मुद्दों पर सरकार से जवाब चाहते हैं और इसी मांग को लेकर वे विरोध दर्ज करा रहे हैं। हालांकि, सत्तापक्ष का तर्क है कि सदन में शांति बनाए रखते हुए ही सार्थक चर्चा संभव है। हंगामे के कारण प्रश्नकाल और अन्य निर्धारित कार्यसूची प्रभावित होने से संसदीय प्रक्रिया पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

लोकसभा में बार-बार स्थगन से यह भी स्पष्ट हुआ कि सरकार और विपक्ष के बीच संवाद की कमी बढ़ती जा रही है। संसदीय परंपराओं के अनुसार, बजट सत्र को देश की आर्थिक दिशा तय करने वाला सत्र माना जाता है। ऐसे में सदन का समय हंगामे की भेंट चढ़ना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चिंताजनक माना जा रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यदि दोनों पक्ष बातचीत के जरिए रास्ता नहीं निकालते हैं तो आने वाले दिनों में भी सदन की कार्यवाही प्रभावित हो सकती है। स्पीकर द्वारा बुलाई गई बैठक को इसी दिशा में एक प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, ताकि सभी दलों को साथ लेकर सदन को सुचारु रूप से चलाया जा सके।

फिलहाल, दोपहर 2 बजे तक के स्थगन के बाद यह देखना अहम होगा कि क्या विपक्ष और सरकार के बीच कोई सहमति बन पाती है या नहीं। सदन की कार्यवाही का भविष्य इसी पर निर्भर करता है कि राजनीतिक दल संसदीय मर्यादाओं के दायरे में रहकर अपनी बात रखने पर सहमत होते हैं या नहीं।