सुप्रीम कोर्ट का आदेश: बिहार में 65 लाख हटाए गए मतदाताओं की सूची 48 घंटे में प्रकाशित करें
नई दिल्ली। बिहार में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान 65 लाख मतदाताओं के नाम ड्राफ्ट लिस्ट से हटाए जाने के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय निर्वाचन आयोग को कड़ा निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि हटाए गए सभी नामों की सूची 48 घंटे के भीतर प्रत्येक जिले के जिला निर्वाचन अधिकारी की वेबसाइट पर प्रकाशित की जाए और साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि नाम काटने की वजह क्या है।
सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्देश
जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने आदेश में कहा—
- जिन मतदाताओं के नाम सूची में नहीं हैं, उनके पहचान पत्र के रूप में आधार कार्ड स्वीकार किया जाए।
- हटाए गए नामों की जानकारी सभी प्रमुख समाचार पत्रों, टीवी और रेडियो के माध्यम से सार्वजनिक की जाए।
- यह सूची बीएलओ के दफ्तर, पंचायत भवन और बीडीओ कार्यालय के बाहर भी लगाई जाए, ताकि लोग आसानी से इसे देख सकें।
- हटाए गए मतदाताओं को यह बताया जाए कि उन्हें सूची से क्यों बाहर किया गया।
मामले की अगली सुनवाई 22 अगस्त को होगी।

याचिकाकर्ताओं का आरोप
याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील निजाम पाशा ने अदालत को बताया कि कई लोगों ने फॉर्म जमा करने के बावजूद अपने नाम सूची में शामिल नहीं कराए जा सके। उन्होंने हलफनामों के साथ उदाहरण देते हुए कहा कि सिर्फ एक बूथ से ही 231 नाम हटा दिए गए, जो 2003 की मतदाता सूची में दर्ज थे। पाशा का आरोप था कि बीएलओ मनमर्जी से काम कर रहे हैं और इससे व्यापक पैमाने पर मतदाताओं के अधिकार प्रभावित हो रहे हैं।
मृत मतदाताओं के नाम सार्वजनिक करने पर सवाल
सुनवाई के दौरान पीठ ने निर्वाचन आयोग से पूछा कि जिन 22 लाख मतदाताओं की मृत्यु हो चुकी है, उनके नाम सार्वजनिक क्यों नहीं किए गए। कोर्ट ने कहा कि यदि मृतकों, विस्थापितों और अन्य श्रेणी में हटाए गए नामों की सूची सार्वजनिक की जाती, तो मतदाता सूची को लेकर जो नकारात्मक धारणा बनी है, वह काफी हद तक समाप्त हो सकती थी।
जस्टिस बागची ने सवाल उठाया कि क्या पुनरीक्षण प्रक्रिया के जरिए वोटर कार्ड स्वतः रद्द हो सकता है? उन्होंने स्पष्ट किया कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 22 के तहत ही प्रारंभिक जांच के बाद वोटर कार्ड रद्द किया जा सकता है।
निर्वाचन आयोग का पक्ष
निर्वाचन आयोग के वकील राकेश द्विवेदी ने कहा कि याचिकाकर्ताओं ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि “बिहार अभी भी अंधकार युग में है।” उन्होंने कहा कि बिहार बौद्धिक लोगों की भूमि है, देश के पहले राष्ट्रपति यहीं से थे, और इस तरह की छवि बनाना गलत है। इस पर जस्टिस बागची ने सहमति जताते हुए कहा कि “बिहार लोकतंत्र की जन्मभूमि भी है।”
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्देश पर कांग्रेस नेताओं ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी।
- केसी वेणुगोपाल ने कहा कि हटाए गए 65 लाख नामों की शीघ्र घोषणा एसआईआर प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने की दिशा में अहम कदम है।
- जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि यह फैसला संविधान की रक्षा करने वाला है और प्रधानमंत्री व उनके समर्थकों की “साजिशों” के खिलाफ उम्मीद की किरण है।
पृष्ठभूमि
बिहार में हाल में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण किया गया था। इसमें लाखों नाम हटाए गए, जिनमें मृतक, स्थानांतरित और अज्ञात मतदाता शामिल हैं। लेकिन बड़ी संख्या में ऐसे भी मतदाता सामने आए, जिन्होंने खुद को योग्य बताया और दावा किया कि उन्हें बिना कारण सूची से हटा दिया गया। इसी को लेकर यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
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