August 31, 2025 2:34 AM

मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: ‘प्रक्रिया मतदाता हितैषी’

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बिहार मतदाता सूची पुनरीक्षण पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी – मतदाता हितैषी प्रक्रिया

नई दिल्ली। बिहार में चुनाव आयोग द्वारा लागू किए गए विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision – SIR) को लेकर चल रहा विवाद अब सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है, जहां बुधवार को हुई सुनवाई में न्यायालय ने इस प्रक्रिया को मतदाता हितैषी बताया। न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह स्पष्ट किया कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण में दस्तावेजों की संख्या पहले से अधिक कर दी गई है, जिससे मतदाताओं को अधिक विकल्प मिल रहे हैं।

दस्तावेजों की संख्या बढ़ने को बताया सकारात्मक कदम

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहले किए जाने वाले सारांश पुनरीक्षण (Summary Revision) में केवल सात दस्तावेजों के आधार पर नाम जुड़वाने या सुधार करवाने की अनुमति थी, जबकि विशेष गहन पुनरीक्षण में यह संख्या बढ़ाकर 11 कर दी गई है। इससे मतदाताओं को अपनी पहचान साबित करने के लिए अधिक विकल्प मिलते हैं और यह प्रक्रिया अधिक समावेशी बनती है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि मतदाता सूची में शामिल होने के लिए 11 दस्तावेजों में से कोई एक प्रस्तुत करना पर्याप्त है। यह कदम इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि इससे उन लोगों को भी सुविधा मिलेगी, जिनके पास पहले उपलब्ध सीमित दस्तावेजों में से कोई नहीं था।

आधार स्वीकार न करने पर आपत्ति

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कोर्ट के सामने तर्क रखा कि दस्तावेजों की संख्या भले बढ़ाई गई हो, लेकिन उनकी वास्तविक पहुंच (coverage) काफी कम है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार में पासपोर्ट धारकों की संख्या केवल 1-2 प्रतिशत है, और स्थायी निवासी प्रमाण पत्र उपलब्ध कराने का भी कोई प्रावधान नहीं है।

सिंघवी का कहना था कि यदि राज्य की कुल आबादी में इन दस्तावेजों की उपलब्धता को देखें, तो स्पष्ट होता है कि अधिकतर लोग इनका लाभ नहीं उठा पाएंगे। विशेष रूप से आधार को मान्यता न देना उनके अनुसार अनुचित है, क्योंकि यह सबसे व्यापक रूप से उपलब्ध पहचान पत्र है।

कोर्ट का जवाब – 36 लाख पासपोर्ट धारक पर्याप्त

इस पर न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि बिहार में 36 लाख पासपोर्ट धारक हैं, जो कवरेज के लिहाज से एक बड़ी संख्या है। साथ ही, उन्होंने बताया कि दस्तावेजों की सूची बनाने से पहले विभिन्न सरकारी विभागों से फीडबैक लिया जाता है, ताकि अधिकतम कवरेज सुनिश्चित किया जा सके।

पीठ ने यह भी कहा कि चुनाव आयोग को अधिकार है कि वह किन्हें मतदाता सूची में शामिल या बाहर करेगा। इसमें अदालत अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करेगी, जब तक प्रक्रिया कानून और संविधान के अनुरूप हो।

आधार और मतदाता कार्ड पर आयोग का रुख

इससे पहले 12 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने यह दोहराया था कि मतदाता सूची में आधार कार्ड और मतदाता पहचान पत्र को नागरिकता के प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि नागरिकों और गैर-नागरिकों के नाम शामिल या बाहर करने का अधिकार केवल चुनाव आयोग के पास है।

विश्वास की कमी से बढ़ा विवाद

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी माना कि एसआईआर को लेकर विवाद का एक बड़ा कारण विश्वास की कमी है। चुनाव आयोग के अनुसार, बिहार की कुल 7.9 करोड़ मतदाता आबादी में से लगभग 6.5 करोड़ लोगों को या उनके माता-पिता को 2003 की मतदाता सूची में शामिल होने के लिए कोई दस्तावेज जमा करने की आवश्यकता नहीं थी। इसका मतलब है कि केवल शेष मतदाताओं को ही नए दस्तावेज प्रस्तुत करने की आवश्यकता पड़ी।

राजनीतिक और सामाजिक असर

यह मामला सिर्फ कानूनी बहस तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक और सामाजिक निहितार्थ भी हैं। संसद के अंदर और बाहर, दोनों जगह इस विषय पर गरमा-गरम बहस जारी है। विपक्ष का आरोप है कि एसआईआर के जरिए कई वास्तविक मतदाताओं को सूची से बाहर करने का खतरा है, जबकि चुनाव आयोग का दावा है कि यह प्रक्रिया मतदाता सूची को अधिक पारदर्शी और अद्यतन बनाने के लिए जरूरी है।

आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में अंतिम निर्णय अभी सुरक्षित रखा है, लेकिन अब तक की टिप्पणियों से यह संकेत मिलता है कि वह चुनाव आयोग की प्रक्रिया में अनावश्यक दखल नहीं देना चाहता, बशर्ते यह प्रक्रिया सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करे। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि अदालत इस संवेदनशील और विवादास्पद मुद्दे पर क्या अंतिम आदेश देती है, क्योंकि इसका असर सीधे तौर पर करोड़ों मतदाताओं के अधिकारों पर पड़ेगा।


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