महाशिवरात्रि फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यह वह समय होता है जब चंद्रमा अपनी सबसे क्षीण अवस्था में होता है और आध्यात्मिक दृष्टि से इसे आत्ममंथन और साधना का विशेष काल माना गया है। चंद्रमा मन का प्रतीक माना जाता है, और जब वह क्षीण होता है तो यह मन की स्थिरता और आत्मनियंत्रण का संकेत देता है। इसी कारण इस तिथि को शिव आराधना के लिए अत्यंत शुभ बताया गया है।
व्रत रखने के लिए केवल चतुर्दशी तिथि होना पर्याप्त नहीं होता। सबसे महत्वपूर्ण तत्व है निशीथ काल। जिस दिन मध्यरात्रि के समय चतुर्दशी तिथि विद्यमान रहती है, उसी दिन महाशिवरात्रि का व्रत रखा जाता है। यदि तिथि दो दिनों में फैली हो, तो निर्णय इस आधार पर किया जाता है कि निशीथ काल किस दिन चतुर्दशी के अंतर्गत आता है। यही कारण है कि कभी-कभी कैलेंडर की तारीख और व्रत के दिन में अंतर दिखाई देता है।
2026 में 15 या 16 फरवरी – सही दिन कौन सा?
वर्ष 2026 में महाशिवरात्रि की तिथि को लेकर जो भ्रम उत्पन्न हो रहा है, उसका मुख्य कारण चतुर्दशी तिथि का दो दिनों में आना है। पंचांग गणना के अनुसार चतुर्दशी फरवरी के मध्य में पड़ रही है, लेकिन यह देखना आवश्यक है कि मध्यरात्रि का निशीथ काल किस दिन चतुर्दशी के अंतर्गत आता है।
यदि चतुर्दशी 15 फरवरी की रात्रि में विद्यमान रहती है और उसी समय निशीथ काल पड़ता है, तो व्रत 15 फरवरी को रखा जाएगा। लेकिन यदि चतुर्दशी 16 फरवरी की मध्यरात्रि तक बनी रहती है और निशीथ काल उस दिन आता है, तो व्रत 16 फरवरी को मान्य होगा। इसलिए अंतिम निर्णय सटीक पंचांग और ज्योतिषीय गणना पर निर्भर करेगा। केवल दिनांक देखकर निर्णय लेना उचित नहीं है।
महाशिवरात्रि का धार्मिक महत्व
महाशिवरात्रि को शिव और शक्ति के दिव्य मिलन की रात्रि कहा गया है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन भगवान शिव और माता पार्वती का विवाह हुआ था। कुछ ग्रंथों में यह भी उल्लेख मिलता है कि इसी रात्रि भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए तांडव किया था। इसीलिए यह रात केवल पूजा का अवसर नहीं, बल्कि सृष्टि संतुलन और ऊर्जा का प्रतीक मानी जाती है।
यह पर्व व्यक्ति को आत्मचिंतन और संयम की प्रेरणा देता है। भक्त इस दिन उपवास रखकर अपने भीतर की नकारात्मक प्रवृत्तियों पर नियंत्रण करने का प्रयास करते हैं। रात्रि जागरण और शिव मंत्र का जाप मानसिक स्थिरता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग माना गया है। धर्म ग्रंथों में कहा गया है कि इस दिन किया गया जप और तप अनेक गुना फल प्रदान करता है।
व्रत का सही तरीका
महाशिवरात्रि का व्रत नियम और श्रद्धा के साथ किया जाता है। प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण किए जाते हैं और दिनभर संयम रखा जाता है। कई लोग निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कुछ फलाहार ग्रहण करते हैं। व्रत का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि मन और इंद्रियों पर नियंत्रण है।
रात्रि में चार प्रहर की पूजा का विधान बताया गया है। प्रत्येक प्रहर में शिवलिंग का अभिषेक जल, दूध, दही, घी, शहद और बेलपत्र से किया जाता है। मंत्र जाप और ध्यान के माध्यम से भक्त शिव तत्व से जुड़ने का प्रयास करता है। पूरी रात जागरण करना साधना का महत्वपूर्ण अंग माना गया है, क्योंकि यह जागरूकता और भक्ति का प्रतीक है।
निशीथ काल का महत्व
निशीथ काल लगभग मध्यरात्रि का वह समय है जब वातावरण में विशेष शांति और स्थिरता होती है। शास्त्रों के अनुसार इसी समय शिव तत्व सर्वाधिक सक्रिय रहता है। इसलिए इस काल में की गई पूजा को अत्यंत फलदायी माना गया है।
इस समय ध्यान और जप करने से मन की अशांति दूर होती है और आध्यात्मिक अनुभव गहरा होता है। केवल दिन में पूजा करने की अपेक्षा निशीथ काल में की गई आराधना को अधिक प्रभावी माना गया है। यही कारण है कि महाशिवरात्रि के व्रत का निर्णय भी इसी काल की उपस्थिति के आधार पर किया जाता है।
व्रत से मिलने वाले आध्यात्मिक लाभ
महाशिवरात्रि का व्रत शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी माना गया है। उपवास से शरीर को विश्राम मिलता है और पाचन तंत्र हल्का होता है। वहीं मन पर संयम रखने से मानसिक स्पष्टता बढ़ती है।
नियमित मंत्र जाप और ध्यान से व्यक्ति के भीतर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। कई साधक इसे आत्मशुद्धि और नई शुरुआत का अवसर मानते हैं। यह पर्व व्यक्ति को अनुशासन, संयम और श्रद्धा का महत्व सिखाता है।
हर साल तारीख को लेकर भ्रम क्यों होता है
पंचांग चंद्रमा की गति के अनुसार चलता है, जबकि सामान्य कैलेंडर सूर्य आधारित होता है। इसी कारण कई पर्वों की तिथि हर वर्ष बदल जाती है। जब चतुर्दशी तिथि दो अलग-अलग दिनों में फैली रहती है, तो भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
ऐसे में सही निर्णय के लिए विश्वसनीय पंचांग या ज्योतिषीय गणना देखना आवश्यक है। स्थानीय परंपराओं और मंदिरों की घोषणा भी मार्गदर्शन का अच्छा स्रोत हो सकती है।
भक्तों को क्या करना चाहिए
यदि तिथि को लेकर भ्रम हो, तो घबराने की आवश्यकता नहीं है। स्थानीय मंदिर, विश्वसनीय पंचांग या अनुभवी ज्योतिषी से जानकारी लेना उचित रहता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्रत श्रद्धा, नियम और विश्वास के साथ किया जाए। सही दिन का चयन महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है भक्ति और सच्ची भावना।
निष्कर्ष
महाशिवरात्रि 2026 की तिथि 15 या 16 फरवरी में से कौन-सी होगी, यह चतुर्दशी तिथि और निशीथ काल की सटीक स्थिति पर निर्भर करेगा। कैलेंडर की तारीख से अधिक महत्वपूर्ण है पंचांग और ज्योतिषीय गणना।
यह पर्व केवल व्रत और पूजा का दिन नहीं, बल्कि आत्मजागरण और आध्यात्मिक उन्नति का अवसर है। सही जानकारी के साथ व्रत रखकर और नियमपूर्वक पूजा कर भक्त शिव कृपा और मानसिक शांति प्राप्त कर सकते हैं।
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