कहा: केवल कथित गलत या त्रुटिपूर्ण न्यायिक आदेश के आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हो सकती
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार द्वारा एक जिला न्यायाधीश को सेवा से हटाने के फैसले को रद्द करते हुए न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर अहम टिप्पणी की है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कहा कि किसी न्यायाधीश के खिलाफ केवल इस आधार पर अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती कि उसने कथित तौर पर गलत या त्रुटिपूर्ण न्यायिक आदेश पारित किए हैं। अदालत ने इस फैसले के जरिए हाईकोर्ट को भी यह संदेश दिया है कि न्यायिक कार्यों और प्रशासनिक अनुशासन के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है।
यह फैसला न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने सुनाया। पीठ ने मध्य प्रदेश के पूर्व अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश निर्भय सिंह सुलिया की याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार के बर्खास्तगी आदेश को निरस्त कर दिया।
क्या था पूरा मामला
निर्भय सिंह सुलिया पर आरोप था कि उन्होंने वर्ष 2014 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में कार्य करते हुए आबकारी अधिनियम से जुड़े मामलों में जमानत याचिकाओं पर निर्णय लेते समय दोहरा मापदंड अपनाया। इसके साथ ही उन पर भ्रष्टाचार से जुड़े कुछ आरोप भी लगाए गए थे। इन्हीं आरोपों के आधार पर उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई और अंततः उन्हें सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
न्यायाधीश ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। उनका तर्क था कि उनके खिलाफ की गई कार्रवाई न्यायिक आदेशों के मूल्यांकन पर आधारित थी, न कि किसी ठोस अनुशासनहीनता या भ्रष्ट आचरण के प्रमाण पर।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि न्यायिक अधिकारी द्वारा पारित आदेश यदि उच्च अदालत की दृष्टि में गलत या त्रुटिपूर्ण भी हों, तो मात्र इसी आधार पर उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जा सकती। अदालत ने कहा कि न्यायाधीशों को स्वतंत्र रूप से अपने विवेक और कानून की समझ के आधार पर निर्णय लेने का अधिकार है। यदि हर गलत माने गए आदेश पर कार्रवाई शुरू कर दी जाए, तो इससे न्यायिक स्वतंत्रता पर गंभीर असर पड़ेगा।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार या गंभीर कदाचार के मामलों में कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन ऐसे मामलों में ठोस साक्ष्य और स्पष्ट आरोप होना जरूरी है। केवल यह कहना कि जमानत आदेशों में दोहरा मापदंड अपनाया गया, अपने आप में बर्खास्तगी जैसे कठोर कदम को सही नहीं ठहराता।
हाईकोर्ट को दी गई अहम सलाह
सुप्रीम कोर्ट ने इस फैसले के साथ हाईकोर्ट को भी एक महत्वपूर्ण सलाह दी। अदालत ने कहा कि न्यायिक अधिकारियों के कामकाज की समीक्षा करते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि न्यायिक आदेशों की वैधता की जांच अपीलीय प्रक्रिया के तहत होती है, न कि विभागीय कार्रवाई के जरिए। हाईकोर्ट को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि अनुशासनात्मक शक्तियों का प्रयोग न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करने के लिए न हो।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर जोर
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत करने वाला है। इससे यह संदेश गया है कि न्यायाधीशों को केवल उनके फैसलों की वजह से डर या दबाव में नहीं रखा जा सकता। यदि किसी आदेश में कानूनी त्रुटि है, तो उसे अपील या पुनरीक्षण के जरिए सुधारा जा सकता है, न कि संबंधित न्यायाधीश को दंडित करके।
अन्य मामलों पर भी सुनवाई
इसी बीच सुप्रीम कोर्ट आज एक अन्य अहम मामले की भी सुनवाई करने जा रहा है, जिसमें एक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर की जमानत याचिका शामिल है। इस इन्फ्लुएंसर को राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने कुछ चीनी कंपनियों के साथ मिलकर लाओस में संगठित मानव तस्करी में शामिल होने के आरोप में गिरफ्तार किया है। इसके अलावा दिल्ली के रिज क्षेत्र में पेड़ों की कटाई से जुड़ी याचिकाओं पर भी सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई प्रस्तावित है।
व्यापक असर वाला फैसला
सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय न केवल संबंधित न्यायाधीश के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि पूरे न्यायिक तंत्र के लिए एक नजीर के रूप में देखा जा रहा है। यह फैसला बताता है कि न्यायिक अधिकारियों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन उसे इस तरह लागू नहीं किया जा सकता कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर ही सवाल खड़े हो जाएं।
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