2018 के फैसले को चुनौती, मौजूदा परंपरा जारी रखने की मांग 14 मार्च से पहले रखेगा बोर्ड 

नई दिल्ली। सबरीमाला मंदिर में प्रजनन आयु की महिलाओं के प्रवेश को लेकर एक बार फिर कानूनी और सामाजिक बहस तेज हो गई है। त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड ने स्पष्ट किया है कि वह सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर मौजूदा परंपराओं की रक्षा का पक्ष रखेगा। बोर्ड अध्यक्ष के जयकुमार के अनुसार, बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि अदालत के समक्ष वर्तमान प्रथा जारी रखने की मांग रखी जाएगी।

बोर्ड ने कहा है कि वह 14 मार्च से पहले अपना रुख औपचारिक रूप से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष स्पष्ट करेगा। साथ ही यह भी दोहराया गया कि वर्ष 2018 में आए उस फैसले का समर्थन नहीं किया जाएगा, जिसमें प्रजनन आयु की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति दी गई थी।

2018 का ऐतिहासिक फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में अपने महत्वपूर्ण निर्णय में सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं को प्रवेश की अनुमति दी थी। इस फैसले को समानता और संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में ऐतिहासिक माना गया था। हालांकि, निर्णय के बाद राज्य में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए और सामाजिक-धार्मिक स्तर पर मतभेद सामने आए।

इसके बाद इस मामले में पुनर्विचार याचिकाएं भी दायर की गईं और विषय संविधान पीठ के समक्ष लंबित है।

परंपरा बनाम समानता की बहस

त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड का तर्क है कि सबरीमाला मंदिर की परंपराएं विशिष्ट धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हैं और उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। बोर्ड का कहना है कि यह मामला केवल प्रवेश का नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और प्रथा से संबंधित है।

दूसरी ओर, समानता और लैंगिक न्याय के पक्षधर समूहों का मानना है कि मंदिर में प्रवेश पर आयु आधारित प्रतिबंध संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट में अगला चरण

अब जब बोर्ड हलफनामा दाखिल करने जा रहा है, तो यह मामला फिर से न्यायिक बहस के केंद्र में आ सकता है। अदालत के समक्ष यह प्रश्न रहेगा कि धार्मिक परंपराओं और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट में होने वाली आगामी सुनवाई इस संवेदनशील मुद्दे की दिशा तय करेगी। देशभर में इस विषय पर नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका प्रभाव केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं, बल्कि व्यापक संवैधानिक और सामाजिक विमर्श से जुड़ा है।