सुस्ती, निर्यात दबाव और वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच मौद्रिक ढील की संभावनाएँ बनीं

नई दिल्ली । भारत की आर्थिक गतिविधियों पर वैश्विक सुस्ती और अंतरराष्ट्रीय जोखिमों के बढ़ते असर को देखते हुए, भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) आने वाले महीनों में ब्याज दरों में और कटौती कर सकता है। केयरएज रेटिंग्स की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, यदि घरेलू विकास दर पर दबाव बढ़ता है, तो केंद्रीय बैंक को आर्थिक गति बनाए रखने के लिए फिर से मौद्रिक नीतियों को नरम करना पड़ सकता है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार पहले ही जीएसटी सुधार, आयकर बोझ में कमी और सीमित राजकोषीय प्रोत्साहन जैसे कदम उठा चुकी है। ऐसे में अब आर्थिक माहौल कमजोर पड़ने पर नीतिगत जिम्मेदारी का अधिक भार आरबीआई की मौद्रिक नीति पर आ सकता है।

25 आधार अंकों की कटौती को विकास समर्थन की दिशा में बड़ा कदम

हाल ही में आरबीआई ने मौद्रिक नीति समीक्षा में रेपो रेट को 25 आधार अंक घटाकर 5.25% कर दिया था। अर्थव्यवस्था में संभावित सुस्ती और घरेलू मांग में कमी को देखते हुए यह कदम विकास को समर्थन देने के उद्देश्य से उठाया गया। केयरएज रेटिंग्स का कहना है कि वैश्विक व्यापार विवाद अमेरिका में टैरिफ बढ़ने का असर निर्यात पर बढ़ता दबाव 

विदेशी बाज़ारों में मांग में गिरावट

इन सभी कारकों के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था पर बाहरी जोखिम तेज़ी से बढ़ रहे हैं। ऐसे में आरबीआई का सतर्क रुख भविष्य के बदलावों को देखते हुए आवश्यक माना जा सकता है।

मुद्रास्फीति स्थिर, इसलिए आगे और कटौती की गुंजाइश

रिपोर्ट में कहा गया है कि मौजूदा मुद्रास्फीति अनुमान और स्थिर दामों की स्थिति को देखते हुए आगे भी 25 आधार अंकों की और कटौती की गुंजाइश मौजूद है। हालाँकि इसके बावजूद मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने फिलहाल विराम लेने का फैसला किया है, ताकि आने वाले त्रैमासिक आंकड़ों और वैश्विक परिस्थितियों को देखकर अधिक सटीक मूल्यांकन किया जा सके। सरकार की ओर से राजकोषीय मोर्चे पर सीमित गुंजाइश होने की वजह से—जैसे टैक्स कटौती, जीएसटी सुधार और राजकोषीय अनुशासन के लक्ष्य—मौद्रिक नीति भविष्य में विकास को सहारा देने का मुख्य साधन बन सकती है।

विकास दर कमजोर हुई तो फिर घट सकती हैं ब्याज दरें

रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में ब्याज दरों का संयुक्त प्रभाव तरलता प्रबंधन, मुद्रास्फीति नियंत्रण, वित्तीय स्थिरता को बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहा है। लेकिन यदि आने वाले महीनों में विकास दर और गिरावट दर्ज करती है, तो आरबीआई द्वारा पुनः नरम मौद्रिक नीति (Rate Cut) अपनाने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। केंद्रीय बैंक का सावधानीपूर्ण लेकिन खुला रुख संकेत देता है कि आर्थिक जोखिमों को देखते हुए भविष्य में एक और रेट कट पूरी तरह संभव है।