अरविंद केजरीवाल समेत आरोपियों को बरी करते हुए अदालत ने कहा: गिरफ्तारी अपवाद हो, नियम नहीं

नई दिल्ली। अरविंद केजरीवाल से जुड़े कथित शराब नीति मामले में विशेष एमपी/एमएलए न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय की कार्यप्रणाली पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां करते हुए कहा है कि हिरासत में बिताया गया समय बाद में बरी होने से सार्थक रूप से वापस नहीं किया जा सकता। न्यायाधीश जितेंद्र सिंह ने सभी आरोपियों को बरी करते हुए स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन एक गंभीर मामला है और गिरफ्तारी तथा लंबी कैद अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं।

यह मामला अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया सहित अन्य आरोपियों से जुड़ा था, जिन्हें प्रवर्तन निदेशालय ने सीबीआई के भ्रष्टाचार मामले के आधार पर धन शोधन निवारण कानून के तहत गिरफ्तार किया था।

पीएमएलए के उपयोग पर अदालत की सख्त टिप्पणी

अदालत ने कहा कि धन शोधन निवारण कानून के तहत अपराध स्वायत्त नहीं है, बल्कि यह अनुसूचित मूल अपराध के अस्तित्व पर निर्भर करता है। यदि आधारभूत अपराध सिद्ध नहीं होता या उसका अस्तित्व ही नहीं रहता, तो धन शोधन का आरोप भी स्वतः टिक नहीं सकता। न्यायालय ने कहा कि मूल अपराध वह आधारशिला है, जिस पर पूरा मामला टिका होता है। यदि आधार ध्वस्त हो जाता है तो ऊपरी ढांचा भी गिर जाएगा।

न्यायाधीश ने कहा कि वर्तमान प्रवृत्ति चिंताजनक है, जिसमें अनुसूचित अपराध से संबंधित मूलभूत तथ्यों की न्यायिक जांच से पहले ही गिरफ्तारी और लंबी हिरासत जैसी दंडात्मक शक्तियों का उपयोग किया जाता है। इससे ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है, जहां व्यक्ति को ऐसे आरोप के आधार पर स्वतंत्रता से वंचित किया जाता है, जिसकी कानूनी वैधता अभी अनिश्चित होती है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का हवाला

अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (2022) फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि जहां मूल अपराध अस्तित्व में नहीं रहता, वहां धन शोधन का अपराध स्वतंत्र रूप से कायम नहीं रह सकता। न्यायालय ने कहा कि इस स्थापित विधिक स्थिति के बावजूद व्यवहार में इसका उलट देखा जा रहा है।

स्वतंत्रता और जांच के बीच संतुलन की जरूरत

अदालत ने आर्थिक अपराधों की प्रभावी जांच और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाए रखने की अपील की। न्यायालय ने टिप्पणी की कि यदि पूर्व-परीक्षण हिरासत स्वयं सजा का विकल्प बन जाए, तो यह न्याय के सिद्धांतों के विपरीत होगा। किसी भी प्रक्रिया को दंडात्मक रूप लेने से बचाना आवश्यक है, विशेषकर तब जब आरोप अभी जांच के अधीन हों।

न्यायालय ने माना कि संसद ने प्रवर्तन निदेशालय को धन शोधन जैसे जटिल अपराधों से निपटने के लिए व्यापक शक्तियां प्रदान की हैं, जिनमें कुर्की, गिरफ्तारी और अभियोजन शामिल हैं। हालांकि, यह भी स्पष्ट किया कि कानून का उद्देश्य चाहे कितना भी वैध और आवश्यक क्यों न हो, वह संवैधानिक सुरक्षा उपायों को कमजोर नहीं कर सकता।

संवैधानिक संतुलन सर्वोपरि

अदालत ने कहा कि जांच एजेंसी की शक्ति और जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के बीच संतुलन कोई विधायी कृपा नहीं, बल्कि संवैधानिक आदेश है। इस संतुलन में किसी भी प्रकार की चूक कानून के शासन और आपराधिक न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को कमजोर कर सकती है।

इस फैसले को धन शोधन निवारण कानून के उपयोग और गिरफ्तारी की प्रक्रिया पर महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली और न्यायिक समीक्षा के दायरे को प्रभावित कर सकता है।