सॉलिसिटर जनरल बोले— राज्य सरकारों के हस्तक्षेप से केंद्रीय एजेंसियों का मनोबल टूटेगा
नई दिल्ली। पश्चिम बंगाल में ईडी द्वारा आई-पैक कार्यालय पर की गई छापेमारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट में अहम सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत के समक्ष कई गंभीर और दूरगामी प्रभाव वाले सवाल उठाए। उन्होंने इस पूरे घटनाक्रम को “चौंकाने वाला पैटर्न” बताते हुए कहा कि जब-जब वैधानिक और संवैधानिक संस्थाएं अपने अधिकारों का प्रयोग करती हैं, तब-तब पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ओर से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हस्तक्षेप देखने को मिलता है। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि इस तरह के हस्तक्षेप न केवल जांच प्रक्रिया को बाधित करते हैं, बल्कि इससे केंद्रीय एजेंसियों और सुरक्षाबलों का मनोबल भी गंभीर रूप से प्रभावित होता है। उन्होंने आगाह किया कि यदि इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगी, तो भविष्य में राज्य सरकारें यह मानने लगेंगी कि वे केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई में दखल दे सकती हैं, अनियमितताएं कर सकती हैं और बाद में दबाव बनाने के लिए धरने या विरोध का सहारा ले सकती हैं।
“यह केवल एक घटना नहीं, बल्कि खतरनाक परंपरा की ओर इशारा”
तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि यह मामला किसी एक छापेमारी या एक एजेंसी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संघीय ढांचे और कानून के शासन से जुड़ा गंभीर प्रश्न है। उन्होंने कहा कि यदि राज्य पुलिस और प्रशासन केंद्रीय एजेंसियों के वैधानिक कार्य में सहयोग करने के बजाय बाधा उत्पन्न करें, तो इससे पूरे देश में कानून व्यवस्था और संस्थागत संतुलन पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। उन्होंने अदालत का ध्यान इस ओर भी दिलाया कि आई-पैक कार्यालय में छापेमारी के दौरान आपत्तिजनक सामग्री मिलने के पर्याप्त सबूत मौजूद थे, इसके बावजूद ईडी अधिकारियों को अपने कर्तव्यों के निर्वहन में गंभीर कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
उपस्थित अधिकारियों के निलंबन की मांग
सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया कि इस मामले में स्पष्ट और कड़ा संदेश देने की आवश्यकता है। उन्होंने मांग की कि जो अधिकारी मौके पर मौजूद थे और जिन्होंने जांच में सहयोग नहीं किया, उन्हें निलंबित किया जाए, ताकि एक उदाहरण स्थापित हो सके। उनका कहना था कि यदि इस तरह की कार्रवाइयों पर सख्त रुख नहीं अपनाया गया, तो भविष्य में केंद्रीय एजेंसियों के लिए निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच करना लगभग असंभव हो जाएगा।
डीजीपी के निलंबन की मांग वाली नई याचिका
गौरतलब है कि एन्फोर्समेंट डायरेक्टरेट ने इस पूरे मामले को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक नई याचिका दायर की है। इसमें पश्चिम बंगाल के डीजीपी राजीव कुमार के निलंबन की मांग की गई है। ईडी का आरोप है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने न केवल जांच में सहयोग नहीं किया, बल्कि उनके आचरण में दुराचार के तत्व भी पाए गए हैं। ईडी ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए जाएं। इस संबंध में केंद्रीय एजेंसी ने कर्मचारी एवं प्रशिक्षण विभाग और गृह मंत्रालय को भी निर्देश देने की मांग की है, ताकि मामले की निष्पक्ष जांच सुनिश्चित हो सके।
संघीय ढांचे और संस्थाओं की स्वतंत्रता पर बहस
इस सुनवाई के दौरान जो मुद्दे उभरकर सामने आए, वे केवल एक राज्य या एक एजेंसी तक सीमित नहीं हैं। यह मामला संघीय ढांचे, राज्यों और केंद्र के बीच शक्तियों के संतुलन तथा संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। सॉलिसिटर जनरल ने अदालत को चेताया कि यदि वैधानिक एजेंसियों को राजनीतिक दबाव में काम करना पड़ेगा, तो इससे लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन को गंभीर क्षति पहुंचेगी। अब सुप्रीम कोर्ट के रुख पर सबकी नजरें टिकी हैं, क्योंकि इस मामले में दिया गया फैसला भविष्य में केंद्र और राज्यों के संबंधों के साथ-साथ जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली की दिशा भी तय कर सकता है।
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