लैंडिंग स्थल की पहचान, अंतिम निर्णय प्रक्षेपण से पहले 

बेंगलुरु । भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने अपने महत्वाकांक्षी चंद्र अभियान चंद्रयान-4 के लिए चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के निकट संभावित उतरने का स्थान चिन्हित कर लिया है। उपलब्ध वैज्ञानिक आंकड़ों और पूर्व मिशनों से मिली उच्च गुणवत्ता की तस्वीरों के विश्लेषण के बाद मॉन्स माउटन क्षेत्र को अभी सबसे उपयुक्त माना जा रहा है। यह इलाका लगभग छह हजार मीटर ऊंचाई वाला पहाड़ी भाग है, जिसकी ऊपरी सतह अपेक्षाकृत समतल बताई जा रही है। समतलता किसी भी सॉफ्ट लैंडिंग के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इससे यान के झुकने, फिसलने या पलटने का खतरा कम होता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यद्यपि इस क्षेत्र को प्राथमिक रूप से उपयुक्त पाया गया है, फिर भी अंतिम निर्णय प्रक्षेपण के निकट ही लिया जाएगा। अंतरिक्ष अभियानों में मौसम, प्रकाश, यांत्रिक गणनाओं और सुरक्षा से जुड़े अनेक पहलुओं का दोबारा मूल्यांकन किया जाता है, ताकि जोखिम को न्यूनतम रखा जा सके।

लंबे समय तक धूप और बर्फ की संभावना से बढ़ा महत्व

दक्षिणी ध्रुव का यह भाग कई कारणों से शोधकर्ताओं के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां सूर्य का प्रकाश अपेक्षाकृत लंबे समय तक उपलब्ध रहता है, जिससे सौर ऊर्जा से संचालित उपकरणों को काम करने में सुविधा मिलती है। इसके साथ ही इस क्षेत्र में जल-बर्फ की मौजूदगी की संभावना भी लंबे समय से जताई जाती रही है। यदि यहां से प्राप्त नमूनों में बर्फ या उससे जुड़े रासायनिक संकेत मिलते हैं, तो भविष्य के मानव अभियानों के लिए संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में बड़ी प्रगति हो सकती है।

चंद्रयान-2 से मिली तस्वीरों ने आसान किया रास्ता

लैंडिंग स्थल के चयन में चंद्रयान-2 के परिक्रमा यान की भूमिका अहम रही है। उसके उच्च विभेदन कैमरे से प्राप्त चित्रों ने सतह की बारीक बनावट, छोटे-छोटे गड्ढों, चट्टानों और ढलानों का विस्तृत आकलन संभव बनाया। लगभग सेंटीमीटर स्तर तक की स्पष्टता ने वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद की कि कौन से क्षेत्र सुरक्षित हैं और किन हिस्सों से बचना चाहिए। इस तरह पहले से संभावित खतरों की पहचान कर मिशन की सफलता की संभावना बढ़ाई जा रही है।

वैज्ञानिक समुदाय के भीतर इन निष्कर्षों को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी साझा किया गया है, जहां चंद्र विज्ञान से जुड़े विशेषज्ञों ने इस अध्ययन में गहरी रुचि दिखाई। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत का चंद्र अनुसंधान वैश्विक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।

नमूने लेकर पृथ्वी लौटने की बड़ी तैयारी

करीब 2104 करोड़ रुपए की लागत वाला यह अभियान केवल उतरने तक सीमित नहीं रहेगा। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि चंद्र सतह से मिट्टी और चट्टानों के नमूने एकत्र कर उन्हें सुरक्षित रूप से पृथ्वी तक वापस लाया जाएगा। इसके लिए अलग-अलग प्रक्षेपण यानों और मॉड्यूलों की जटिल संरचना तैयार की गई है। एक भाग सतह पर उतरकर नमूने जुटाएगा, जबकि दूसरा भाग उन्हें पृथ्वी तक पहुंचाने की जिम्मेदारी निभाएगा।

इस पूरी प्रक्रिया में सटीक समय-निर्धारण, स्वचालित संचालन, कक्षा परिवर्तन और पुनः प्रवेश जैसी अत्यंत जटिल तकनीकों का उपयोग होगा। यही वजह है कि इसे अब तक के सबसे चुनौतीपूर्ण अभियानों में गिना जा रहा है।

तकनीकी कसौटियों पर परखा जाएगा हर कदम

चंद्रयान-4 के माध्यम से भारत न केवल नमूना वापसी की क्षमता प्रदर्शित करेगा, बल्कि गहरे अंतरिक्ष अभियानों में अपनी तकनीकी परिपक्वता भी दिखाएगा। सुरक्षित लैंडिंग, नमूना संग्रह, उन्हें संरक्षित रखना और फिर लंबी यात्रा के बाद पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश कराना—इन सभी चरणों में सूक्ष्मतम त्रुटि भी बड़े असर डाल सकती है। इसलिए वैज्ञानिक दल लगातार कई वैकल्पिक योजनाओं और सुरक्षा उपायों पर काम कर रहा है।

इस मिशन की सफलता भविष्य में मानव सहित अभियानों, चंद्र आधारों की परिकल्पना और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के नए रास्ते खोल सकती है। दुनिया की बड़ी अंतरिक्ष एजेंसियां भी दक्षिणी ध्रुव की ओर ध्यान दे रही हैं, ऐसे में भारत की सक्रिय उपस्थिति रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।