एक लाख से अधिक दस्तावेज अपलोड न होने पर आयोग सख्त, 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची जारी करने की तैयारी
कोलकाता । कोलकाता में चल रही विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान बड़ी प्रशासनिक चूक सामने आने के बाद केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने सख्त रुख अपनाया है। आयोग ने मतदाता सूची से संबंधित दस्तावेजों को समय पर ऑनलाइन अपलोड न करने के मामले में संबंधित मतदाता पंजीकरण अधिकारियों और सहायक मतदाता पंजीकरण अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करने का निर्णय लिया है।
सूत्रों के अनुसार, सुनवाई प्रक्रिया समाप्त होने के चार दिन बाद भी लगभग एक लाख पंद्रह हजार दस्तावेज ऑनलाइन प्रणाली में अपलोड नहीं किए गए। इस देरी को गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना जा रहा है। मुख्य निर्वाचन अधिकारी कार्यालय के सूत्रों का दावा है कि करीब 120 मतदाता पंजीकरण अधिकारी और 150 सहायक मतदाता पंजीकरण अधिकारी इस चूक के लिए जिम्मेदार पाए गए हैं।
आयोग ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि यदि किसी मतदाता का आवेदन अस्वीकृत किया जाता है, तो उसका विशिष्ट और स्पष्ट कारण दर्ज किया जाए। लेकिन आरोप है कि कई मामलों में इन निर्देशों का पालन नहीं किया गया। इससे न केवल पारदर्शिता पर सवाल उठे हैं, बल्कि मतदाताओं के अधिकारों पर भी प्रभाव पड़ सकता है।
इससे पहले भी आयोग ने दो मतदाता पंजीकरण अधिकारियों, नौ सहायक अधिकारियों, एक डाटा प्रविष्टि कर्मी और तीन सूक्ष्म प्रेक्षकों के विरुद्ध कार्रवाई की थी। वर्तमान कार्रवाई को उसी क्रम की अगली कड़ी माना जा रहा है, जिसमें आयोग प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने के लिए कठोर कदम उठा रहा है।
28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची जारी करने की तैयारी
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद राज्य में 28 फरवरी को अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित करने की तैयारी तेज कर दी गई है। समयसीमा को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी मनोज कुमार अग्रवाल से दूरभाष पर बातचीत कर स्थिति की समीक्षा की।
सूत्रों के अनुसार, मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने आश्वस्त किया है कि निर्धारित तिथि पर ही अंतिम मतदाता सूची जारी कर दी जाएगी। जिन मतदाताओं के नाम, पते या अन्य विवरण में त्रुटियां पाई जाएंगी, उनके सुधार के लिए बाद में एक अतिरिक्त सूची भी प्रकाशित की जा सकती है।
मतदाता सूची का समय पर और सही प्रकाशन किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया की बुनियाद माना जाता है। ऐसे में आयोग की सख्ती को चुनावी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा जा रहा है। प्रशासनिक स्तर पर अब यह सुनिश्चित करने की कोशिश की जा रही है कि निर्धारित समयसीमा के भीतर सभी लंबित कार्य पूर्ण हों और मतदाताओं को किसी प्रकार की असुविधा न हो।
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