लोकसभा मॉनसून सत्र 2025: 84 घंटे हंगामे की भेंट, चर्चा से ज्यादा शोरगुल
नई दिल्ली। लोकसभा का मॉनसून सत्र गुरुवार को समाप्त हो गया। एक माह तक चला यह सत्र उम्मीदों के विपरीत रहा, क्योंकि चर्चा और नीतिगत बहस से अधिक समय शोरगुल और हंगामे में निकल गया। लोकसभा सचिवालय के अनुसार, इस सत्र में कुल 21 बैठकें हुईं, लेकिन 84 घंटे से अधिक समय हंगामे और जबरन स्थगन की भेंट चढ़ गया। यह अब तक की 18वीं लोकसभा का सबसे अधिक व्यर्थ हुआ समय है।
शुरुआत में सहमति, अंत में गतिरोध
मॉनसून सत्र की शुरुआत 21 जुलाई को हुई थी। उस समय सभी राजनीतिक दलों ने यह सहमति जताई थी कि कुल 120 घंटे कामकाज और चर्चा के लिए निर्धारित रहेंगे। व्यापार सलाहकार समिति ने भी इसे मंजूरी दी थी। लेकिन सत्र के दौरान लगातार टकराव, विपक्ष के विरोध और योजनाबद्ध हंगामे ने कार्यवाही को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने जानकारी दी कि पूरे सत्र में मात्र 37 घंटे 7 मिनट ही प्रभावी कामकाज हो पाया। इसके बावजूद सरकार ने सीमित समय में 14 विधेयक पेश किए और 12 अहम विधेयक पारित कराए।

पारित हुए महत्वपूर्ण विधेयक
हंगामे के बीच सरकार ने कई महत्वपूर्ण विधेयक सदन से पारित कराए। इनमें प्रमुख रूप से —
- ऑनलाइन गेमिंग को बढ़ावा और नियमन विधेयक, 2025
- खनिज और खनन (विकास और विनियमन) संशोधन विधेयक, 2025
- राष्ट्रीय खेल शासन विधेयक, 2025 शामिल हैं।
विवादित विधेयक और विपक्ष का विरोध
सबसे अधिक विवाद 20 अगस्त को देखने को मिला, जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तीन अहम विधेयक पेश किए। इन विधेयकों में यह प्रावधान शामिल था कि यदि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री गंभीर आपराधिक आरोपों के तहत 30 दिन तक जेल में रहते हैं, तो उन्हें पद से हटाया जा सकता है।
इस प्रस्ताव पर विपक्ष ने तीखा विरोध किया और सदन में जमकर नारेबाजी हुई। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच गरमागरम बहस के चलते कार्यवाही कई बार बाधित हुई। विपक्ष का आरोप था कि सरकार इस तरह के प्रावधानों के जरिए संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की स्वायत्तता को प्रभावित करना चाहती है।
इस हंगामे का असर यह हुआ कि पूरे सत्र में निजी सदस्यों के बिलों पर बिल्कुल भी चर्चा नहीं हुई। न कोई बिल पेश किया गया और न ही किसी पर बहस या मतदान हो सका।
प्रश्नकाल और समितियों की स्थिति
सत्र के दौरान 537 मुद्दे नियम 377 के तहत उठाए गए, जिनमें कई अहम सार्वजनिक मुद्दे शामिल थे। लेकिन, 61 नोटिस जो सार्वजनिक महत्व के विषयों पर चर्चा के लिए दिए गए थे, उनमें से एक भी स्वीकार नहीं हुआ।
हालांकि, संसदीय समितियों ने सक्रियता दिखाई और कुल 124 रिपोर्टें सदन में पेश कीं। इनमें 89 विभागीय स्थायी समितियों की और 18 वित्तीय समितियों की रिपोर्टें प्रमुख थीं। मंत्रियों की ओर से सदन में 53 बयान दिए गए।
प्रश्नकाल की स्थिति भी निराशाजनक रही। इस दौरान 419 तारांकित प्रश्न स्वीकार किए गए, लेकिन उनमें से मात्र 55 प्रश्नों का ही मौखिक उत्तर दिया जा सका। वहीं, 4,829 बिना तारांकित प्रश्न स्वीकार किए गए।
सरकार और विपक्ष का आकलन
सत्र के समापन पर सरकार ने इसे अपनी उपलब्धि करार दिया। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा—
“यह सत्र सरकार और देश के लिए सफल और फलदायी रहा, लेकिन विपक्ष के लिए असफल और नुकसानदायक साबित हुआ।”
सरकार का मानना है कि सीमित समय के बावजूद कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराए गए, जो जनहित और विकास से जुड़े हैं। वहीं, विपक्ष का आरोप है कि सरकार विपक्ष की आवाज़ दबाने और बहस से बचने की रणनीति पर चल रही है।
लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर प्रश्न
इस सत्र का सबसे बड़ा निष्कर्ष यह रहा कि भारतीय लोकतंत्र की सबसे अहम संस्था, लोकसभा, में संवाद और विमर्श का स्थान शोरगुल और गतिरोध ने ले लिया। 84 घंटे से अधिक समय का नुकसान केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि यह उस अवसर का नुकसान भी है, जिसमें जनता के मुद्दों पर गंभीर चर्चा हो सकती थी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि यह रुझान आगे भी जारी रहा, तो लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की गुणवत्ता और जनता का विश्वास दोनों प्रभावित होंगे।
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